Thursday, June 5, 2014

दुर्घटना से मृत्यु योग :अकस्मात मृत्यु के योग : आत्म हत्या से मृत्यु योग :शांति के उपाय :Accidental death Yoga: Yoga sudden death: death from suicide :Upay

अकस्मात मृत्यु के योग एवं शांति के उपाय  
प्रश्न: अकस्मात मृत्यु के कौन-कौन से योग हैं? 
विस्तार से इनकी व्याख्या करें तथा ऐसी मृत्यु से बचाव के लिए किस प्रकार के उपाय सार्थक हो सकते हैं? मानव शरीर में आत्मबल, बुद्धिबल, मनोबल, शारीरिक बल कार्य करते हैं। 
चन्द्र के क्षीण होने से मनुष्य का मनोबल कमजोर हो जाता है, विवेक काम नहीं करता और अनुचित अपघात पाप कर्म कर बैठता है। अमावस्या व एकादशी के बीच तथा पूर्णिमा के आस-पास चन्द्र कलायें क्षीण व बढ़ती हैं इसलिये 60 : ये घटनायें इस समय में होती हैं। तमोगुणी मंगल का अधिकार सिर, एक्सीडेन्ट, आगजनी, हिंसक घटनाओं पर होता है तो शनि का आधिपत्य मृत्यु, फांसी व वात सम्बन्धी रोगों पर होता है। छाया ग्रह राहु-केतु का प्रभाव आकस्मिक घटनाओं तथा पैंर, तलवों पर विशेष रहता है। ग्रहों के दूषित प्रभाव से अल्पायु, दुर्घटना, आत्महत्या, आकस्मिक घटनाओं का जन्म होता है। 
आकस्मिक मृत्यु के स्थान का ज्ञान 
1- लग्न की महादशा हो और अन्तर्दशा लग्न के शत्रु ग्रह की हो तो मनुष्य की अकस्मात मृत्यु होती है।
 2- छठे स्थान के स्वामी का सम्बन्ध मंगल से हो तो अकस्मात आपरेशन से मृत्यु हो।
 3- लग्न से तृतीय स्थान में या कारक ग्रह से तृतीय स्थान में सूर्य हो तो राज्य के कारण मृत्यु हो।
4- यदि शनि चर व चर राशि के नवांश में हो तो दूर देश में मृत्यु हो।
 5- अष्टम में स्थिर राशि हो उस राशि का स्वामी स्थिर राशि में हो तो गृह स्थान में जातक की मृत्यु होती है। 6- द्विस्वभाव राशि अष्टम स्थान मं हो तथा उसका स्वामी भी द्विस्वभाव राशिगत हो तो पथ (रास्ते) में मृत्यु हो। 
7- तीन ग्रह एक राशि में बैठे हों तो जातक सहस्र पद से युक्त पवित्र स्थान गंगा के समीप मरता है। 
8- लग्न से 22 वें द्रेष्काण का स्वामी या अष्टमभाव का स्वामी नवम भाव में चन्द्र हो तो काशीतीर्थ बुध$शुक्र हो तो द्वारिका में मृत्यु हो। 
9- अष्टम भाव में गुरु चाहे किसी राशि में हो व्यक्ति की मृत्यु बुरी हालत में होती है। 
मृत्यु फांसी के द्वारा 
1- द्वितीयेश और अष्टमेश राहु व केतु के साथ 6, 8, 12 वें भाव में हो। सारे ग्रह मेष, वृष, मिथुन राशि में हो।
2- चतुर्थ स्थान में शनि हो दशम भाव में क्षीण चन्द्रमा के साथ मंगल शनि बैठे हों 
3- अष्टम भाव बुध और शनि स्थित हो तो फांसी से मृत्यु हो। 
4- क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ 9, 5, 11 वे भाव में हो। 
5- शनि लग्न में हो और उस पर शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा सूर्य, राहु क्षीण चन्द्रमा युत हों तो जातक की गोली या छुरे से मृत्यु अथवा हत्या हो। 
6- नवमांश लग्न में सप्तमेश राहु, केतु से युत 6, 8, 12 वें भाव मं स्थित हों तो आत्महत्या करता है। 
7- चैथे व दसवें या त्रिकोण भाव में अशुभ ग्रह हो या अष्टमेश लग्न में मंगल से युत हो तो फांसी से मृत्यु होती है 
8- क्षीण चन्द्रमा पाप ग्रह के साथ पंचम या एकादश स्थान में हो तो सूली से मृत्यु होती है।
 दुर्घटना से मृत्यु योग 
1- चतुर्थेश, षष्ठेश व अष्टमेश से सम्बन्ध हो तो मृत्यु वाहन दुर्घटना मं हो। 2- यदि अष्टम भाव में चन्द्र, मंगल, शनि हो तो मृत्यु हथियार द्वारा हो।
 3- चन्द्र सूर्य मंगल शनि 8, 5 तथा 9 में हो तो मृत्यु ऊँचाई से गिरने समुद्र, तूफान या वज्रपात से हो।
 4- अष्टमेश तथा अष्टम, षष्ठ तथा षष्ठेश और मंगल का इन सबसे सम्बन्ध हो तो मृत्यु शत्रु द्वारा होती है। 
5- अष्टमेश एवं द्वादशेश में भाव परिवर्तन हो, इन पर मंगल की दृष्टि हो तो अकाल मौत हो। जन्म विषघटिका में होने से विष, अग्नि क्रूरजीव से मृत्यु हो। 
6- जन्म लग्न से दशम भाव में सूर्य चतुर्थ भाव में मंगल हो तो मृत्यु वाहन दुर्घटना तथा सवारी से गिरने से होती है। 
7- मंगल और सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम भाव में क्षीण चन्द्र के साथ हो तो पक्षी के कारण दुर्घटना में मृत्यु हो। 
8- सूर्य, मंगल, केतु की यति हो जिस पर पाप ग्रहों की दृष्टि हो तो अग्नि दुर्घटना में मृत्यु हो। चन्द्र मेष$ वृश्चिक राशि में हो तो पाप ग्रह की दृष्टि से अग्नि अस्त्र से मृत्यु हो। 9- द्विस्वभाव राशि लग्न में सूर्य+चन्द्र हो तो जातक की मृत्यु जल में डूबने से हो। 
10- लग्नेश और अष्टमेश कमजोर हो, मंगल षष्ठेश से युत हो तो मृत्यु युद्ध में हो। द्वादश भाव में मंगल अष्टम भाव में शनि से हथियार द्वारा हत्या हो।
 11- यदि नंवाश लग्न में सप्तमेश शनि युत हो 6, 8, 12 में हो जहर खाने से मृत्यु हो । 
12- चन्द्र मंगल अष्टमस्थ हो तो सर्पदंश से मृत्यु होती है। 
13- लग्नेश अष्टमेश और सप्तमेश साथ बैठे हों तो जातक स्त्री के साथ मरता है। 
आत्म हत्या से मृत्यु योग 
1- लग्न व सप्तम भाव में नीच ग्रह हों 
2- लग्नेश व अष्टमेश का सम्बन्ध व्ययेश से हो। 3- अष्टमेश जल तत्व हो तो जल में डूबने से, अग्नि तत्व हो तो जलकर, वायु तत्व हो तो तूफान व बज्रपात से अपघात हो । 4- कर्क राशि का मंगल अष्टम भाव में पानी में डूबकर आत्मघात कराता है 5- यदि अष्टम भाव में एक या अधिक अशुभ ग्रह हो तो जातक हत्या, अपघात, दुर्घटना, बीमारी से मरता है। ग्रहों के अनुसार स्त्री पुरूष के आकस्मिक मृत्यु योग 
1- चतुर्थ भाव में सूर्य और मंगल स्थित हों, शनि दशम भाव मं स्थित हो तो शूल से मृत्यु तुल्य कष्ट तथा अपेंडिक्स रोग से मौत हो सकती है। 2- द्वितीय स्थान में शनि, चतुर्थ स्थान में चन्द्र, दशम स्थान में मंगल हो तो घाव में सेप्टिक से मृत्यु होती है। 3- दशम स्थान में सूर्य और चतुर्थ स्थान में मंगल स्थित हो तो कार, बस, वाहन या पत्थर लगने से मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। 4- शनि कर्क और चन्द्रमा मकर राशिगत हो तो जल से अथवा जलोदर से मृत्यु हो। 5- शनि चतुर्थस्थ, चन्द्रमा सप्तमस्थ और मंगल दशमस्थ हो तो कुएं में गिरने से मृत्यु होती है 6- क्षीण चन्द्रमा अष्टम स्थान में हो उसके साथ मं$रा$शनि हो तो पिशाचादि दोष से मृत्यु हो।
 7- जातक का जन्म विष घटिका में होने से उसकी मृत्यु विष, अग्नि तथा क्रूर जीव से होती है। 
8- द्वितीय में शनि, चतुर्थ में चन्द्र और दशम में मंगल हो तो मुख मं कृमिरोग से मृत्यु होती है। 
9- शुभ ग्रह दशम, चतुर्थ, अष्टम, लग्न में हो और पाप ग्रह से दृष्ट हो तो बर्छी की मार से मृत्यु हो। 
10- यदि मंगल नवमस्थ और शनि, सूर्य राहु एकत्र हो, शुभ ग्रह दृष्ट न हो तो बाण से मृत्यु हो 11- अष्टम भाव में चन्द्र के साथ मंगल, शनि, राहु हो तो मृत्यु मिर्गी से हो। 
12- नवम भाव में बुध शुक्र हो तो हृदय रोग से मृत्यु होती है। 
13- अष्टम शुक्र अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो मृत्यु गठिया या मधुमेह से होती है 
14- स्त्री की जन्म कुण्डली सूर्य, चन्द्रमा मेष राशि या वृश्चिक राशिगत होकर पापी ग्रहों के बीच हो तो महिला शस्त्र व अग्नि से अकाल मृत्यु को प्राप्त होती है।
15- स्त्री की जन्म कुण्डली में सूर्य एवं चन्द्रमा लग्न से तृतीय, षष्ठम, नवम, द्वादश भाव में स्थित हो तो तथा पाप ग्रहों की युति व दृष्टि हो तो महिला फंासी लगाकर या जल में कूद कर आत्म हत्या करती है। 
16- द्वितीय भाव में राहु, सप्तम भाव में मंगल हो तो महिला की विषाक्त भोजन से मृत्यु हो 
17- सूर्य एवं मंगल चतुर्थ भाव अथवा दशम भाव में स्थित हो तो स्त्री पहाड़ से गिर कर मृत्यु को प्राप्त होती है। 18- दशमेश शनि की व्ययेश एवं सप्तमेश मंगल पर पूर्ण दृष्टि से महिला की डिप्रेशन से मृत्यु हो। 
19- पंचमेश नीच राशिगत होकर शत्रु ग्रह शुक्र एवं शनि से दृष्ट हो तो प्रसव के समय मृत्यु हो । 
20- महिला की जन्मकुण्डली में मंगल द्वितीय भाव में हो, चन्द्रमा सप्तम भाव में हो, शनि चतुर्थ भाव में हो तो स्त्री कुएं, बाबड़ी, तालाब में कूद कर मृत्यु को प्राप्त होती है। 
लग्नेश के नवांश से मृत्यु, रोग अनुमान 
1- मेष नवांश हो तो ज्वर, ताप जठराग्नि तथा पित्तदोष से मृत्यु हो 
2- वृष नवांश हो तो दमा, शूल त्रिदोषादि, ऐपेंडिसाइटिस से मृत्यु हो। 
3- मिथुन नवांश हो तो सिर वेदना, 
4- कर्क नवांश वात रोग व उन्माद से मृत्यु हो। 
5- सिंह नवांश हो तो विस्फोटकादि, घाव, विष, शस्त्राघात और ज्वर से मृत्यु। 
6- कन्या नवांश हो तो गुह्य रोग, जठराग्नि विकार से मृत्यु हो। 
7- तुला नवांश में शोक, बुद्धि दोष, चतुष्पद के आघात से मृत्यु हो। 
8- वृश्चिक नवांश में पत्थर अथवा शस्त्र चोट, पाण्डु ग्रहणी वेग से। 
9- धनु नवांश में गठिया, विष शस्त्राघात से मृत्यु हो। 
10- मकर नवांश में व्याघ्र, शेर, पशुओं से घात, शूल, अरुचि रोग से मृत्यु। 
11- कुंभ नवांश में स्त्री से विष पान श्वांस तथा ज्वर से मृत्यु हो। 
12- मीन नवांश में जल से तथा संग्रहणी रोग से मृत्यु हो। 
गुलिक से मृत्युकारी रोग अनुमान 
1- गुलिक नवांश से सप्तम शुभग्रह हो तो मृत्यु सुखकारी होगी। 
2- गुलिक नवांश से सप्तम स्थान में मंगल हो तो जातक की युद्ध लड़ाई में मृत्यु होगी। 
3- गुलिक नवांश से सप्तम स्थान में शनि हो तो मृत्यु चोर, दानव, सर्पदंश से होगी। 
4- गुलिक नवांश से सप्तम स्थान में सूर्य हो तो राजकीय तथा जलजीवांे से मृत्यु। अरिष्ट महादशा व दशान्तर में मृत्यु 1- अष्टमेश भाव 6, 8, 12 मं हो तो अष्टमेश की दशा-अन्तर्दशा में और दशमेश के बाद के ग्रह अन्तर्दशा में मृत्यु होती है। 
2- कर्क, वृश्चिक, मीन के अन्तिम भाग ऋक्ष संधि कहलाते हैं। ऋक्ष सन्धि ग्रह की दशा मृत्युकारी होती है। 
3- जिस महादशा में जन्म हो महादशा से तीसरा, पांचवां, सातवें भाव की महादशा यदि नीच, अस्त, तथा शत्रु ग्रह की हो तो मृत्यु होती है। 
4- द्वादशेश की महादशा में द्वितीयेश का अन्तर आता है अथवा द्वितीयेश दशा में द्वादश अन्तर में अनिष्टकारी मृत्यु तुल्य होता है। 
5- छिद्र ग्रह सात होते हैं 
1. अष्टमेश, 2. अष्टमस्थ ग्रह, 3. अष्टमदर्शी ग्रह, 4. लग्न से 22 वां द्रेष्काण अर्थात अष्टम स्थान का द्रेष्काण जिसे रवर कहते हैं उस द्रेष्काण स्वामी, 5. अष्टमेश के साथ वाला ग्रह, 6. चन्द्र नवांश से 64 वां नवांशपति, 7. अष्टमेश का अतिशत्रु ग्रह। 
इन सात में से सबसे बली ग्रह की महादशा कष्टदायक व मृत्युकारी होगी। 
  उपाय 
1. आकस्मिक मृत्यु के बचाव के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। 
जप रुद्राक्ष माला से पूर्वी मुख होकर करें।
 2. वाहन चलाते समय मादक वस्तुओं का सेवन न करें तथा अभक्ष्य वस्तुओं का सेवन न करें अन्यथा पिशाची बाधा हावी होगी वैदिक गायत्री मंत्र कैसेट चालू रखें। 
3. गोचर कनिष्ठ ग्रहों की दशा में वाहन तेजी से न चलायें। 
4. मंगल का वाहन दुर्घटना यंत्र वाहन में लगायें, उसकी विधिवत पूजा करें। 
5. नवग्रह यंत्र का विधिविधान पूर्वक प्रतिष्ठा कर देव स्थान में पूजा करें।
6. सूर्य कलाक्षीण हो तो आदित्य हृदय स्तोत्र, चन्द्र की कला क्षीण हो तो चन्द्रशेखर स्तोत्र, मंगल की कला क्षीण हो तो हनुमान स्तोत्र, शनि कला क्षीण हो तो दशरथकृत शनि स्तोत्र का पाठ करें। राहु की कला क्षीण हो तो भैरवाष्टक व गणेश स्तोत्र का पाठ करें। गणित पद्धति से अरिष्ट दिन मृत्यु समय के लग्न, अरिष्ट मास का ज्ञान अरिष्ट मास: 
1- लग्न स्फूट और मांदी स्फुट को जोड़कर जो राशि एवं नवांश हो उस राशि के उसी नवांश पर जब गोचर में सूर्य आता है तब जातक की मृत्यु होती है। 
2- लग्नेश के साथ जितने ग्रह हां उन ग्रहों की महादशा वर्ष जोड़कर 12 का भाग दें। जो शेष बचे उसी संख्यानुसार सौर मास में अरिष्ट होगा। 
अरिष्ट दिन: 
1- मांदी स्फुट और चन्द्र स्फुट को जोड़कर 18 से गुणन करें उसमें शनि स्फुट को जोड़कर 9 से गुणन कर जोड़ दें। जब गोचर चन्द्र उस राशि के नवांश में जाता है तो उस दिन अरिष्ट दिन होगा। मृत्यु समय लग्न का ज्ञान: 2- लग्न स्फुट मांदी स्फुट और चन्द्र स्फुट को जोड़ देने से जो राशि आये उसी राशि के उदय होने पर जातक की मृत्यु होती है। अकस्मात मृत्यु से बचाव हेतु उपाय: सर्व प्रथम जातक की कुण्डली का सूक्ष्म अवलोकन करने के पश्चात निर्णय लें कि किस ग्रह के कारण अकस्मात मृत्यु का योग निर्मित हो रहा है। उस ग्रह का पूर्ण विधि-विधान से जप, अनुष्ठान, यज्ञ, दानादि करके इस योग से बचा जा सकता है। 
बृहत पराशर होरा शास्त्रम् के अनुसार: ‘‘सूर्यादि ग्रहों के अधीन ही इस संसार के प्राणियों का समस्त सुख व दुःख है। इसलिए शांति, लक्ष्मी, शोभा, वृष्टि, आयु, पुष्टि आदि शुभफलों की कामना हेतु सदैव नव ग्रहों का यज्ञादि करना चाहिए।’’ मूर्ति हेतु धातु: ग्रहों की पूजा हेतु सूर्य की प्रतिमा ताँबें से, चन्द्र की स्फटिक से, मंगल की लाल चन्दन से, बुध व गुरु की स्वर्ण से, शुक्र चांदी से, शनि की लोहे से , राहु की सीसे से व केतु की कांसे से प्रतिमा बनानी चाहिए। अथवा पूर्वोक्त ग्रहों के रंग वाले रेशमी वस्त्र पर उनकी प्रतिमा बनानी चाहिए।
 यदि इसमें भी सामथ्र्य न हो तो जिस ग्रह की जो दिशा है उसी दिशा में गन्ध से मण्डल लिखना चहिए। 
विधान पूर्वक उस ग्रह की पूजा करनी चाहिए, मंत्र जप करना चाहिए। ग्रहों के रंग के अनुसार पुष्प, वस्त्र इत्यादि लेना चाहिए। 
जिस ग्रह का जो अन्न व वस्तु हो उसे दानादि करना चाहिए। 
ग्रहों के अनुसार समिधाएं लेकर ही हवनादि करना चाहिए। 
ग्रहों के अनुसार ही भक्ष्य पदार्थ सेवन करने व कराने चाहिए। 
जिस जातक की कुण्डली में ग्रह अशुभ फल देते हों, खराब हों, निर्बल हों, अनिष्ट स्थान में हों, नीचादिगत हो उस ग्रह की पूजा विधि-विधान से करना चाहिए। इन ग्रहों को ब्रह्माजी ने वरदान दिया है कि इन्हें जो पूजेगा ये उसे पूजित व सम्मानित बनाएंगे। 
ग्रह-पीड़ा निवारण प्रयोग (दत्तात्रेय तंत्र के अनुसार): एक मिट्टी के बर्तन में मदार की जड़ (आक की जड़), धतूरा, चिर-चिरा, दूब, बट, पीपल की जड़, शमीर, शीशम, आम, गूलर के पत्ते, गो-घृत, गो दुग्ध, चावल, चना, गेहँ, तिल, शहद और छाछ भर कर शनिवार के दिन सन्ध्याकाल में पीपल वृक्ष की जड़ में गाड़ देने से समस्त ग्रहों की पीड़ा व अरिष्टों का नाश होता है।
 मंत्र: ऊँ नमो भास्कराय अमुकस्य अमुकस्य मम सर्व ग्रहाणां पीड़ानाशनं कुरु कुरु स्वाहा। इस मंत्र का घट गाड़ते समय 21 बार उच्चारण करें व नित्य 11 बार प्रातः शाम जप करें । 
इसके अतिरिक्त महामृत्युंजय का जाप व अनुष्ठान की अकस्मात मृत्यु योग को टालने में सार्थक है। इसके भी विभिन्न मंत्र इस प्रकार हैं एकाक्षरी ‘‘हौं’’ त्राक्षरी ‘‘ऊँ जूँ सः’’ चतुरक्षरी ‘‘ऊँ वं जूं सः’’ नवाक्षरी ‘‘ऊँ जं सः पालय पालय’’ दशाक्षरी ‘‘ऊँ जूं सः मां पालय पालय’’ पंचदशाक्षरी ‘‘ऊँ जं सः मां पालय पालय सः जं ऊँ’’ वैदिक-त्रम्बक मृत्युंजय मंत्र ‘‘त्रम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।’’ मृत्युंजय मंत्र ‘‘ऊँ भूः ऊँ स्वः ऊँ त्रम्बकं यजामहे.................माऽमृतात् ऊँ स्वः ऊँ भुवः ऊँ भूः ऊँ।’’ मृत संजीवनी मंत्र ‘‘ऊँ हौं जूं सः ऊँ भूर्भुव स्वः ऊँ त्रम्बकं यजामहे....... माऽमृतात् ऊँ स्वः ऊँ भुवः भूः ऊँ सः जूं हौं ऊँ।। उपरोक्त उपायों को बुद्धिमत्ता पूर्वक विधि-विधान से किए जायें तो यह उपाय अकस्मात मृत्यु को टालने में सार्थक हो सकते हैं।
By फ्यूचर समाचार
 
जिंदगी इतनी खूबसूरत तो आत्महत्या क्यों?
 अमित सेन
मध्यप्रदेश के इंदौर में एक ही दिन में 6 लोगों के आत्महत्या कर ली। कारण अलग-अलग थे। बड़ी वजह परिवार का दबाव, बहुत ज्यादा नकारात्मकता और मानसिक तनाव था।
हर तरफ चर्चा है कि ऐसा क्यों हो रहा है और आज की पीढ़ी को इससे कैसे रोका जा सकता है? आमतौर पर देखा जाता है कि यदि आप धार्मिक या आध्यात्मिक व्यक्ति हैं तो इस तरह के विचार आप के मन में कभी नहीं पनपेंगे और आप इस तरह का कोई कदम नहीं उठाएंगे। यह बात शास्त्रों में तो पहले ही लिख दी गई थी, इसे अब विज्ञान भी मानता है।
दरअसल आधुनिक समाज में धर्म एवं धार्मिक भावना कम हो रही है। ऐसे में आत्महत्या जैसी बुराई के निवारण के लिए आवश्यक है कि ईश्वर भक्ति, योगा, चिंतन, मनन जैसे क्रियाकलाप रोज किए जाएं। ऐसा करने से आपके अंदर सकारात्मक ऊर्जा का संचार होगा और आत्महत्या जैसे बुरे विचार आपके मस्तिष्क को छू भी नहीं पाएंगे।
वर्तमान दौर में किसी भी आयुवर्ग के व्यक्ति को असफलता सहज स्वीकार्य नहीं होती। किंतु यह स्थिति, किशोरावस्था व युवावस्था में बेहद संवेदनशील होती है। जब किसी युवा को लगने लगता है कि वह अपने अभिभावकों के स्वप्न को साकार नहीं कर पाएगा तो वह नकारात्मक सोच में डूब जाता है और इस तरह की परिस्थिति उसे कहीं न कहीं उसे आत्महत्या के लिए विवश करती है।
ज्योतिष की नजर से...
अहमदाबाद के ज्योतिषी व्यापक लोढ़ा बताते हैं कि ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को आत्मा और चंद्रमा को मनु का कारक माना गया है। अष्टम चंद्रमा नीच राशि में अथवा राहु को शनि के साथ विष योग और केतु के साथ ग्रहण योग उत्पन्न करता है। ऐसे समय में मनुष्य की सोचने समझने में शक्ति कम कर देता है। उसकी वजह से वो अपनी निर्णय शक्ति खो देता है। अगर 12वें भाव में ऐसी युति होने पर फांसी या आत्महत्या का योग बनता है। इसी तरह अनन्य भाव में अलग- अलग परिणाम उत्पन करता है।
बचने के ये उपाय भी हैं कारगर
शास्त्रों में इससे बचने के लिए शिव स्तुति, महामृत्युंजय मंत्र, शिवकवच, देवीकवच और शिवाभिषेक सबसे सहज सरल और प्रभावी उपाय हैं। किसी भी ग्रह के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए शुभ ग्रह की स्तुति और नीच ग्रह का दान श्रेष्ठ रहता है।
जिन्हें आत्महत्या के विचार आते हों, ऐसे व्यक्तियों को मोती एवं स्फटिक धारण करना चाहिए, और नियमित भगवान शिव का जलाभिषेक करना लाभप्रद रहते हैं। इसके अलावा पांच अन्न(गेहूं, ज्वार, चावल, मूंग,जवा और बाजरा) दान करना चाहिए। इसके साथ ही पक्षियों को इन अन्न के दाने भी खिलाना चाहिए।
आत्महत्या का कारण वास्तु भी?
जिस घर में आत्महत्या होती है, उस घर में दो या दो से अधिक वास्तुदोष अवश्य होते हैं। इनमें से एक दोष घर के ईशान कोण (पूर्व- उत्तर) में होता है और दूसरा दक्षिण पश्चिम में होता है। घर में दक्षिण पश्चिम जगह कोण के वास्तुदोष जैसे भूमिगत पानी की टंकी, कुआं, बोरवेल, बेसमेंट या किसी भी प्रकार से इस कोने का फर्श नीचा हो।
इस दोष के साथ यदि उस घर के पश्चिम र्नैत्य कोण में मुख्य द्वार हो तो घर के पुरूष सदस्य के साथ और यदि मुख्य द्वार दक्षिण र्नैत्य कोण में हो तो उस घर की स्त्री द्वारा आत्महत्या की संभावना बलवती हो जाती है।
दूसरा वास्तुदोष घर के ईशान कोण में होता है। जैसे - घर का यह कोना अंदर दब जाए, कट जाए, गोल हो जाए या किसी कारण पूर्व आग्नेय (ईस्ट आफ साऊथ ईस्ट) की ओर दीवार आगे बढ़ जाए तो घर के पुरूष सदस्य द्वारा और यदि उत्तर वायव्य (नार्थ आफ द नार्थ वेस्ट) की दीवार आगे बढ़ जाए तो घर की स्त्री सदस्य द्वारा आत्महत्या की जा सकती है।
इसी प्रकार घर के दक्षिण र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो स्त्रियां और पश्चिम र्नैत्य में मार्ग प्रहार हो तो पुरूष उन्माद जैसे रोगों के शिकार होंगे और कहीं-कहीं वे आत्महत्या भी कर सकते हैं व पूर्व आग्नेय कोण ढंके तो पुरूष द्वारा और उत्तर वायव्य ढंके तो भी स्त्री द्वारा आत्महत्या करने की संभावना बन जाती है। उपरोक्त आत्महत्याओं जैसी दुःखद घटनाओं से बचने का एकमात्र उपाय है कि, घर के वास्तुदोषों को दूर किया जा सकता है।
कहता है विज्ञान
इंदौर के मनोचिकित्सक डॉ. अभय जैन बताते हैं कि आत्महत्या का मूल कारण दरअसल डिप्रेशन है। आत्महत्या के मानसिक, सामाजिक, साइकोलॉजिकल, बायोलॉजिकल एवं जेनेटिक कारण होते हैं। ऐसे व्यक्ति जिनमें आत्महत्या के जीन होते हैं, उनमें बायोकेमिकल परिवर्तन हो जाते हैं और वह आत्महत्या जैसा घृणित कदम उठाते हैं।
इसके कई कारण होते हैं जैसे तनावपूर्ण जीवन, घरेलू समस्याएं, मानसिक रोग आदि। जिन लोगों में आत्महत्या के बारे में सोचने की आदत (सुसाइडल फैंटेसी) होती है, वही आत्महत्या ज्यादा करते हैं। नकारात्मकता आत्महत्या की बहुत बड़ी वजह हैं क्योंकि इस समय आप सही सलाह नही ले पाते। वहीं आत्महत्या का विचार करने वाले लोग यदि धर्म और अध्यात्म का सहारा लें तो इस समस्या से छुटकारा पा सकते हैं।
युवावस्था संक्रमण काल है, युवाओं को कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। खासतौर से कॅरियर, जॉब, रिश्ते, खुद की इच्छाएं, व्यक्तिगत समस्याएं जैसे लव अफेयर, मैरिज, सैटलमेंट, भविष्य की पढ़ाई आदि।
जब वह इस अवस्था में आता है, तो बेरोजगारी का शिकार हो जाता है और भविष्य के प्रति अनिश्चितता बढ़ जाती है। अपरिपक्वता के कारण कई बार परेशानियां आती हैं। जिससे डिप्रेशन, एंग्जाइटी, सायकोसिस, पर्सनालिटी डिसऑर्डर की स्थिति बन जाती है।
महत्वपूर्ण तथ्य
आत्महत्या पर पहली संस्थागत रिसर्च 1958 में लॉस एंजिल्स में हुई थी।
आत्महत्या, दुनिया में मौत का दसवां सबसे बड़ा कारण है।
किशोरावस्था और 35 वर्ष से कम आयुवर्ग में आत्महत्या, असमय मृत्यु का सबसे बड़ा कारण है।
हर साल दुनिया में एक से दो करोड़ से भी ज्यादा लोग आत्महत्या की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी मौत नहीं होती।

कुंडली में मृत्यु योग
पंडित कौशल पाण्डेय
हमारे प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने ज्योतिष की गड़ना के आधार पर जीवन और मृत्यु के बारे में कुछ योग बताएं है जसके आधार पर मृत्यु कैसे होगी किस प्रकार से होगी आइये देखते है इस लेख के माध्यम से कुछ त्रुटी हो तो इस पर अपना प्रकाश अवश्य डाले धन्यवाद् ..
लग्नेश के नवांश से मृत्यु का ज्ञान:-जन्म कुंडली में लग्न चक्र और नवांश को देखकर यह बताया जा सकता है की मृत्यु कैसे होगी ..
लग्नेश का नवांश मेष हो तो पिŸादोष, पीलिया, ज्वर, जठराग्नि आदि से संबंधित बीमारी से मृत्यु होती है।
लग्नेश का नवांश वृष हो तो एपेंडिसाइटिस, शूल या दमा आदि से मृत्यु होती है।
लग्नेश मिथुन नवांश में हो तो मेनिन्जाइटिस, सिर शूल, दमा आदि से मृत्यु होती है।
लग्नेश कर्क नवांश में हो तो वात रोग से मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश सिंह नवांश में हो तो व्रण, हथियार या अम्ल से अथवा अफीम, मय आदि के सेवन से मृत्यु होती है।
कन्या नवांश में लग्नेश के होने से बवासीर, मस्से आदि रोग से मृत्यु होती है।
तुला नवांश में लग्नेश के होने से घुटने तथा जोड़ांे के दर्द अथवा किसी जानवर के आक्रमण चतुष्पद (पशु) के कारण मृत्यु होती है।
लग्नेश वृश्चिक नवांश में हो तो संग्रहणी, यक्ष्मा आदि से मृत्यु होती है।
लग्नेश धनु नवांश में हो तो विष ज्वर, गठिया आदि के कारण मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश मकर नवांश में हो तो अजीर्ण, अथवा, पेट की किसी अन्य व्याधि से मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश कुंभ नवांश में हो तो श्वास संबंधी रोग, क्षय, भीषण ताप, लू आदि से मृत्यु हो सकती है।
लग्नेश मीन नवांश में हो धातु रोग, बवासीर, भगंदर, प्रमेह, गर्भाशय के कैंसर आदि से मृत्यु होती है।हत्या एवं आत्महत्या के योग प्रश्न:-
जन्म के समय के आकाशीय ग्रह योग मानव के जन्म-मृत्यु का निर्धारण करते हैं। शरीर के संवेदनशील तंत्र के ऊपर चंद्र का अधिकार होता है। चंद्र अगर शनि, मंगल, राहु-केतु, नेप्च्यून आदि ग्रहों के प्रभाव में हो तो मन व्यग्रता का अनुभव करता है। दूषित ग्रहों के प्रभाव से मन में कृतघ्नता के भाव अंकुरित होते हैं, पाप की प्रवृŸिा पैदा होती है और मनुष्य अपराध, आत्महत्या, हिंसक कर्म आदि की ओर उन्मुख हो जाता है। चंद्र की कलाओं में अस्थिरता के कारण आत्महत्या की घटनाएं अक्सर एकादशी, अमावस्या तथा पूर्णिमा के आस-पास होती हंै। मनुष्य के शरीर में शारीरिक और मानसिक बल कार्य करते हैं। मनोबल की कमी के कारण मनुष्य का विवेक काम करना बंद कर देता है और अवसाद में हार कर वह आत्महत्या जैसा पाप कर बैठता है।
आत्महत्या करने वालों में 60 प्रतिशत से अधिक लोग अवसाद या किसी न किसी मानसिक रोग से ग्रस्त होते हैं।
आत्महत्या के कारण मृत्यु योग जन्म कुंडली में निम्न स्थितियां हों तो जातक आत्महत्या की तरफ उन्मुख होता है।
लग्न व सप्तम स्थान में नीच ग्रह हो। अष्टमेश पाप ग्रह शनि राहु से पीड़ित हो। अष्टम स्थान के दोनों तरफ अर्थात् सप्तम व नवम् भाव में पापग्रह हों।
चंद्र पाप ग्रह से पीड़ित हो, उच्च या नीच राशिस्थ हो अथवा मंगल व केतु की युति में हो। सप्तमेश और सूर्य नीच भाव का हो तथा राहु शनि से दृष्टि संबंध रखता हो।
लग्नेश व अष्टमेश का संबंध व्ययेश से हो। मंगल व षष्ठेश की युति हो, तृतीयेश, शनि और मंगल अष्टम में हों।
अष्टमेश यदि जल तत्वीय हो तो जातक पानी में डूबकर और यदि अग्नि तत्वीय हो तो जल कर आत्महत्या करता है।
कर्क राशि का मंगल अष्टम भाव में हो तो जातक पानी में डूबकर आत्महत्या करता है।
हत्या या आत्महत्या के कारण होने वाली मृत्यु के अन्य योग:
यदि मकर या कुंभ राशिस्थ चंद्र दो पापग्रहों के मध्य हो तो जातक की मृत्यु फांसी, आत्महत्या या अग्नि से होती है। चतुर्थ भाव में सूर्य एवं मंगल तथा दशम भाव में शनि हो तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है। यदि अष्टम भाव में एक या अधिक अशुभ ग्रह हों तो जातक की मृत्यु हत्या, आत्महत्या, बीमारी या दुर्घटना के कारण होती है।
यदि अष्टम भाव में बुध और शनि स्थित हों तो जातक की मृत्यु फांसी से होती है। यदि मंगल और सूर्य राशि परिवर्तन योग में हों और अष्टमेश से केंद्र में स्थित हों तो जातक को सरकार द्वारा मृत्यु दण्ड अर्थात् फांसी मिलती है। शनि लग्न में हो और उस पर किसी शुभ ग्रह की दृष्टि न हो तथा सूर्य, राहु और क्षीण चंद्र युत हों तो जातक की गोली या छुरे से हत्या होती है।
यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, राहु या केतु से युत हो तथा भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो जातक की मृत्यु फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेने से होती है।
यदि चंद्र से पंचम या नवम राशि पर किसी अशुभ ग्रह की दृष्टि या उससे युति हो और अष्टम भाव अर्थात 22वें द्रेष्काण में सर्प, निगड़, पाश या आयुध द्रेष्काण का उदय हो रहा हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करने से मृत्यु को प्राप्त होता है। चैथे और दसवें या त्रिकोण भाव में अशुभ ग्रह स्थित हो या अष्टमेश लग्न में मंगल से युत हो तो जातक फांसी लगाकर आत्महत्या करता है।
दुर्घटना के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ और दषम भाव में से किसी एक में सूर्य और दूसरे में मंगल हो उसकी मृत्यु पत्थर से चोट लगने के कारण होती है।
यदि शनि, चंद्र और मंगल क्रमशः चतुर्थ, सप्तम और दशम भाव में हांे तो जातक की मृत्यु कुएं में गिरने से होती है।
सूर्य और चंद्र दोनों कन्या राशि में हों और पाप ग्रह से दृष्ट हों तो जातक की उसके घर में बंधुओं के सामने मृत्यु होती है।
यदि कोई द्विस्वभाव राशि लग्न में हो और उस में सूर्य तथा चंद्र हों तो जातक की मृत्यु जल में डूबने से होती है।
यदि चंद्र मेष या वृश्चिक राशि में दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो जातक की मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से पंचम और नवम भावों में पाप ग्रह हों और उन दोनों पर किसी भी शुभ ग्रह की दृष्टि नहीं हो, उसकी मृत्यु बंधन से होती है।
जिस जातक के जन्मकाल में किसी पाप ग्रह से युत चंद्र कन्या राशि में स्थित हो, उसकी मृत्यु उसके घर की किसी स्त्री के कारण होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में सूर्य या मंगल और दशम में शनि हो, उसकी मृत्यु चाकू से होती है।
यदि दशम भाव में क्षीण चंद्र, नवम में मंगल, लग्न में शनि और पंचम में सूर्य हो तो जातक की मृत्यु अग्नि, धुआं, बंधन या काष्ठादि के प्रहार के कारण होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से चतुर्थ भाव में मंगल, सप्तम में सूर्य और दशम में शनि स्थित हांे उसकी मृत्यु शस्त्र या अग्नि दुर्घटना से होती है।
जिस जातक के जन्म लग्न से दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो उसकी मृत्यु सवारी से गिरने से या वाहन दुर्घटना में होती है।
यदि लग्न से सप्तम भाव में मंगल और लग्न में शनि, सूर्य एवं चंद्र हों उसकी मृत्यु मशीन आदि से होती है।
यदि मंगल, शनि और चंद्र क्रम से तुला, मेष और मकर या कुंभ में स्थित हों तो जातक की मृत्यु विष्ठा में गिरने से होती है।
मंगल और सूर्य सप्तम भाव में, शनि अष्टम में और क्षीण चंद्र में स्थित हो उसकी मृत्यु पक्षी के कारण होती है।
यदि लग्न में सूर्य, पंचम में मंगल, अष्टम में शनि और नवम में क्षीण चंद्र हो तो जातक की मृत्यु पर्वत के शिखर या दीवार से गिरने अथवा वज्रपात से होती है।
सूर्य, शनि, चंद्र और मंगल लग्न से अष्टमस्थ या त्रिकोणस्थ हों तो वज्र या शूल के कारण अथवा दीवार से टकराकर या मोटर दुर्घटना से जातक की मृत्यु होती है।
चंद्र लग्न में, गुरु द्वादश भाव में हो, कोई पाप ग्रह चतुर्थ में और सूर्य अष्टम में निर्बल हो तो जातक की मृत्यु किसी दुर्घटना से होती है।
यदि दशम भाव का स्वामी नवांशपति शनि से युत होकर भाव 6, 8 या 12 में स्थित हो तो जातक की मृत्यु विष भक्षण से होती है।
यदि चंद्र या गुरु जल राशि (कर्क, वृश्चिक या मीन) में अष्टम भाव में स्थित हो और साथ में राहु हो तथा उसे पाप ग्रह देखता हो तो सर्पदंश से मृत्यु होती है।
यदि लग्न में शनि, सप्तम में राहु और क्षीण चंद्र तथा कन्या में शुक्र हो तो जातक की शस्त्राघात से मृत्यु होती है।
यदि अष्टम भाव तथा अष्टमेश से सूर्य, मंगल और केतु की युति हो अथवा दोनों पर उक्त तीनों ग्रहों की दृष्टि हो तो जातक की मृत्यु अग्नि दुर्घटना से होती है।
यदि शनि और चंद्र भाव 4, 6, 8 या 12 में हांे तथा अष्टमेश अष्टम भाव में दो पाप ग्रहों से घिरा हो तो जातक की मृत्यु नदी या समुद्र में डूबने से होती है।
लग्नेश, अष्टमेश और सप्तमेश यदि एक साथ बैठे हों तो जातक की मृत्यु स्त्री के साथ होती है।
यदि कर्क या सिंह राशिस्थ चंद सप्तम या अष्टम भाव में हो और राहु से युत हो तो मृत्यु पशु के आक्रमण के कारण होती है।
दशम भाव में सूर्य और चतुर्थ में मंगल स्थित हो तो वाहन के टकराने से मृत्यु होती है। अष्टमेश एवं द्वादशेश में भाव परिवर्तन हो तथा इन पर मंगल की दृष्टि हो तो जातक की अकाल मृत्यु होती है। षष्ठ, अष्टम अथवा द्वादश भाव में चंद्र, शनि एवं राहु हों तो जातक की मृत्यु अस्वाभाविक तरीके से होती है।
लग्नेश एवं अष्टमेश बलहीन हों तथा मंगल षष्ठेश के साथ हो तो जातक की मृत्यु कष्टदायक होती है।
चंद्र, मंगल एवं शनि अष्टमस्थ हों तो मृत्यु शस्त्र से होती है। षष्ठ भाव में लग्नेश एवं अष्टमेश हों तथा षष्ठेश मंगल से दृष्ट हो तो जातक की मृत्यु शत्रु द्वारा या शस्त्राघात से होती है।
लग्नेश और अष्टमेश अष्टम भाव में हों तथा पाप ग्रहों से युत दृष्ट हों तो जातक की मृत्यु प्रायः दुर्घटना के कारण होती है।
चतुर्थेश, षष्ठेश एवं अष्टमेश में संबंध हो तो जातक की मृत्यु वाहन दुर्घटना में होती है। अष्टमस्थ केतु 25 वें वर्ष में भयंकर कष्ट अर्थात् मृत्युतुल्य कष्ट देता है।
यदि अष्टम भाव में चंद्र, मंगल, और शनि हों तो जातक की मृत्यु हथियार से होती है।
यदि द्वादश भाव में मंगल और अष्टम भाव में शनि हो तो भी जातक की मृत्यु हथियार द्वारा होती है।
यदि षष्ठ भाव में मंगल हो तो भी जातक की मृत्यु हथियार से होती है। यदि राहु चतुर्थेश के साथ षष्ठ भाव में हो तो मृत्यु डकैती या चोरी के समय उग्र आवेग के कारण होती है।
यदि चंद्र मेष या वृश्चिक राशि में पापकर्तरी योग में हो तो जातक जलने से या हथियार के प्रहार से मृत्यु को प्राप्त होता है।
यदि अष्टम भाव में चंद्र, दशम में मंगल, चतुर्थ में शनि और लग्न में सूर्य हो तो मृत्यु कुंद वस्तु से होती है।
यदि सप्तम भाव में मंगल और लग्न में चंद्र तथा शनि हों तो मृत्यु संताप के ।वचार गोष्ठी कारण होती है।
यदि लग्नेश और अष्टमेश कमजोर हों और मंगल षष्ठेश से युत हो तो मृत्यु युद्ध में होती है।
यदि नवांश लग्न से सप्तमेश, शनि से युत हो या भाव 6, 8 या 12 में हो तो मृत्यु जहर खाने से होती है।
यदि चंद्र और शनि अष्टम भाव में हांे और मंगल चतुर्थ में हो या सूर्य सप्तम में अथवा चंद और बुध षष्ठ भाव में हांे तो जातक की मृत्यु जहर खाने से होती है।
यदि शुक्र मेष राशि में, सूर्य लग्न में और चंद्र सप्तम भाव में अशुभ ग्रह से युत हो तो स्त्री के कारण मृत्यु होती है।
यदि लग्न स्थित मीन राशि में सूर्य, चंद्र और अशुभ ग्रह हों तथा, अष्टम भाव में भी अशुभ ग्रह हों तो दुष्ट स्त्री के कारण मृत्यु होती है।
विभिन्न दुर्घटना योग:
लग्नेश और अष्टमेश दोनों अष्टम में हांे। अष्टमेश पर लाभेश की दृष्टि हो (क्योंकि लाभेश षष्ठ से षष्ठम भाव का स्वामी होता है)।
द्वितीयेश, चतुर्थेश और षष्ठेश का परस्पर संबंध हो। मंगल, शनि और राहु भाव 2, 4 अथवा 6 में हों। तृतीयेश क्रूर हो तो परिवार के किसी सदस्य से तथा चतुर्थेश क्रूर हो तो जनता से आघात होता है। अष्टमेश पर मंगल का प्रभाव हो, तो जातक गोली का शिकार होता है। अगर शनि की दृष्टि अष्टमेश पर हो और लग्नेश भी वहीं हो तो गाड़ी, जीप, मोटर या ट्राॅली से दुर्घटना हो सकती है।
बीमारी के कारण मृत्यु योग:-
जिस जातक के जन्मकाल में शनि कर्क में एवं चंद्र मकर में बैठा हो अर्थात् देानों ही ग्रहों में राशि परिवर्तन हो, उसकी मृत्यु जलोदर रोग से या जल में डूबने से होती है।
यदि कन्या राशि में चंद्र दो पाप ग्रहों के मध्य स्थित हो तो जातक की मृत्यु रक्त विकार या क्षय रोग से होती है।
यदि शनि द्वितीय भाव में और मंगल दशम में हों तो मृत्यु शरीर में कीड़े पड़ने से होती है।
जिस जातक के जन्मकाल में क्षीण चंद्र बलवान मंगल से दृष्ट हो और शनि लग्न से अष्टम भाव में स्थित हो तो उसकी मृत्यु गुप्त रोग या शरीर में कीड़े पड़ने से या शस्त्र से या अग्नि से होती है।
अष्टम भाव में पाप ग्रह स्थित हो तो मृत्यु अत्यंत कष्टकारी होती है। इसी भाव में शुभ ग्रह स्थित हो और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो गुप्त रोग या नेत्ररोग की पीड़ा से मृत्यु होती है। क्षीण चंद्र अष्टमस्थ हो और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो इस स्थिति में भी उक्त रोगों से मृत्यु होती है।
यदि अष्टम भाव में शनि एवं राहु हांे तो मृत्यु पुराने रोग के कारण होती है। यदि अष्टम भाव में चंद्र हो और साथ में मंगल, शनि या राहु हो तो जातक की मृत्यु मिरगी से होती है।
यदि अष्टम भाव में मंगल हो और उस पर बली शनि की दृष्टि हो तो मृत्यु सर्जरी या गुप्त रोग अथवा आंख की बीमारी के कारण होती है।
यदि बुध और शुक्र अष्टम भाव में हांे तो जातक की मृत्यु नींद में होती है।
यदि मंगल लग्नेश हो (यदि मंगल नवांशेश हो) और लग्न में सूर्य और राहु तथा सिंह राशि में बुध और क्षीण चंद्र स्थित हों तो जातक की मृत्यु पेट के आपरेशन के कारण होती है।
जब लग्नेश या सप्तमेश, द्वितीयेश और चतुर्थेश से युत हो तो अपच के कारण मृत्यु होती है। यदि बुध सिंह राशि में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो जातक की मृत्यु बुखार से होती है। यदि अष्टमस्थ शुक्र अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो मृत्यु गठिया या मधुमेह के कारण होती है।
यदि बृहस्पति अष्टम भाव में जलीय राशि में हो तो मृत्यु फेफड़े की बीमारी के कारण होती है।
यदि राहु अष्टम भाव में अशुभ ग्रह से दृष्ट हो तो मृत्यु चेचक, घाव, सांप के काटने, गिरने या पिŸा दोष से मृत्यु होती है।
यदि मंगल षष्ठ भाव में सूर्य से दृष्ट हो तो मृत्यु हैजे से होती है। यदि मंगल और शनि अष्टम भाव में स्थित हों तो धमनी में खराबी के कारण मृत्यु होती है। नवम भाव में बुध और शुक्र हों तो हृदय रोग से मृत्यु होती है। यदि चंद्र कन्या राशि में अशुभ ग्रहों के घेरे में हो तो मृत्यु रक्त की कमी के कारण होती है।

जानिए आपके घर में कौन सी दिशा है खतरनाक
वास्तु के अनुसार घर के दक्षिणी भाग में किसी भी तरह का दोष होना सबसे ज्यादा परेशानी देने वाला माना जाता है। घर के दक्षिणी कोने में जितना ज्यादा वास्तु का ध्यान रखा जाता है। घर में उतनी ही अधिक समृद्धि रहती है। इसलिए जब भी घर बनवाये तो दक्षिण दिशा के वास्तु का विशेष ध्यान रखें क्योंकि वास्तु के अनुसार इस दिशा में किसी भी तरह का वास्तुदोष होने पर घर के सदस्यों को अकास्मिक दुर्घटना का सामना करना पड़ सकता है।
- दक्षिणमुखी भूखण्ड पर मार्ग की ओर से भूखण्ड के सिरे से ही भवन का निर्माण करना चाहिए।
- दक्षिणमुखी भूखण्ड पर बने भवन का जल उत्तर दिशा से निकास हो तो स्त्रियों को स्वास्थ्य लाभ के साथ धन लाभ भी होता है। यदि उत्तर दिशा से जल का निकास न हो सके तो पूर्व दिशा से जल का निकास होना। ऐसा करने पर पुरुष यशस्वी व स्वस्थ होंगे।
- दक्षिण दिशा में भवन के सम्मुख टीले, पहाड़ी और कोई ऊंचा भवन हो तो शुभ फलदायी होता है।
- भूखण्ड का दक्षिण भाग कभी भी नीचे न रखें, यदि रखेंगे तो घर की स्त्रियां अस्वस्थ, धन हानि और आकस्मिक मृत्यु का सामना करना पड़ेगा।
- दक्षिण भाग में कभी भी कुआं या बोरिंग न करवाएं। ऐसा करने से धनहानि, दुर्घटना व आकस्मिक मृत्यु का सामना करना पड़ सकता है।
- दक्षिण भाग में बनने वाले कक्षों के बरामदे या फर्श नीचा न बनाएं। कोशिश यही करें कि इस भाग में जो भी निर्माण करें वह पूर्व, उत्तर व ईशान दिशा की अपेक्षा ऊंचा हो।
- दक्षिण भाग में खाली स्थान न छोड़ें यदि छोड़ें तो नाम मात्र का हो।
- भवन निर्माण करते समय अन्य महत्वपूर्ण वास्तु सिद्धांतों का पालन अवश्य करें।
क्या आपको भी हैं ये परेशानियां? ये 3 शनि मंत्र बोल करें दूर
धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक शनि की दशा जैसे ढैय्या, साढ़े साती या महादशा में शनि ग्रह के अशुभ प्रभाव व्यावहारिक जीवन के अनेक कामों में बाधाएं पैदा कर सकती है। हिन्दू धर्म में शनिवार का दिन शनिदेव की उपासना से शनि ग्रह दोष शांति के लिए बहुत ही शुभ माना जाता है। परेशानियों से छुटकारे के लिए शास्त्रों में शनि के तीन मंत्र जप खासतौर पर प्रभावी माने गए हैं। जानते हैं इन शनि मंत्रों के अचूक असर से कौन-कौन सी पीड़ा दूर होती है और इन मंत्रों के जप की सरल विधि -
- हर काम में नुकसान
- विरोधी परेशानी का कारण बने हो
- रोग में दवाई का असर नहीं कर रही हो
- कारोबार में नाकामी
- मेहनत के मुताबिक सफलता नहीं
- संतान की असफलता
- शनिवार के दिन नवग्रह या शनि मंदिर में बदन पर लाल लुंगी पहनकर भीगकर ही शनिदेव पर तेल चढ़ाते हुए इन तीन मंत्रों में से किसी की भी एक माला का जप करें -
- ॐ शं शनैश्चराय नम:
- ॐ प्रां प्रीं प्रौं स: शनये नम:
- ॐ शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये शंयोरभिस्त्रवन्तुन:

अकालमृत्यु कारण और निवारण :-
कई बार लोग प्रश्न करते है कि हम लोग रोज मंदिर जाते है खूब तीरथ व्रत भी करते है लेकिन शांति नहीं मिलती है उल्टा परेशानिया आ जाती है कई बार देखा गया है तीर्थों में गए लेकिन वापस घर नहीं आये या रस्ते में ही अकालमृत्यु को प्राप्त हो गए
अकाल मृत्यु वो मरे जो काम करे चंडाल का,काल उसका क्या बिगाड़े जो भक्त हो महाकाल का -
ये इसलिए कहा गया है कि सभी भूत -प्रेत के अधिपति शिव जी है जो भक्त शिव कि पूजा करता है उसे काल कुछ नहीं करेगा ऐसा नहीं है जब जन्म हुआ है तो मृत्यु तो नियश्चित है परन्तु आकाल मृत्यु न हो उसके लिए शुद्ध मन से शिव जी कि पूजा करे।
ज्योतिष में अकाल मृत्यु के योग
मानव शरीर में आत्मबल, बुद्धिबल, मनोबल, शारीरिक बल कार्य करते हैं।
चन्द्र के क्षीण होने से मनुष्य का मनोबल कमजोर हो जाता है, विवेक काम नहीं करता और अनुचित अपघात पाप कर्म कर बैठता है।
ग्रहों के दूषित प्रभाव से अल्पायु, दुर्घटना, आत्महत्या, आकस्मिक घटनाओं का जन्म होता है।
1. आकस्मिक मृत्यु के बचाव के लिए महामृत्युंजय मंत्र का जप करें। जप रुद्राक्ष माला से पूर्वी मुख होकर करें।
2. वाहन चलाते समय मादक वस्तुओं का सेवन न करें तथा अभक्ष्य वस्तुओं का सेवन न करें अन्यथा पिशाची बाधा हावी होगी वैदिक गायत्री मंत्र कैसेट चालू रखें।
3. गोचर कनिष्ठ ग्रहों की दशा में वाहन तेजी से न चलायें।
अकस्मात मृत्यु से बचाव हेतु उपाय:
सर्व प्रथम जातक की कुण्डली का सूक्ष्म अवलोकन करने के पश्चात निर्णय लें कि किस ग्रह के कारण अकस्मात मृत्यु का योग निर्मित हो रहा है।
उस ग्रह का पूर्ण विधि-विधान से जप, अनुष्ठान, यज्ञ, दानादि करके इस योग से बचा जा सकता है।
बृहत पराशर होरा शास्त्रम् के अनुसार: ‘‘सूर्यादि ग्रहों के अधीन ही इस संसार के प्राणियों का समस्त सुख व दुःख है। इसलिए शांति, लक्ष्मी, शोभा, वृष्टि, आयु, पुष्टि आदि शुभफलों की कामना हेतु सदैव नव ग्रहों का यज्ञादि करना चाहिए।’’

कई बार अनजाने में कई प्रकार कि गलतिया कर बैठते है जिसका परिणाम ठीक नहीं होता है कृपया इन बातों का ध्यान दीजिये —
1. किसी निर्जन एकांत या जंगल आदि में मलमूत्र त्याग करने से पूर्व उस स्थान को भलीभांति देख लेना चाहिए कि वहां कोई ऐसा वृक्ष तो नहीं है जिस पर प्रेत आदि निवास करते हैं अथवा उस स्थान पर कोई मजार या कब्रिस्तान तो नहीं है।
2. किसी नदी तालाब कुआं या जलीय स्थान में थूकना या मल-मूत्र त्याग करना किसी अपराध से कम नहीं है क्योंकि जल ही जीवन है। जल को प्रदूषित करने स जल के देवता वरुण रूष्ट हो सकते हैं।
3. घर के आसपास पीपल का वृक्ष नहीं होना चाहिए क्योंकि पीपल पर प्रेतों का वास होता है।
4. सूर्य की ओर मुख करके मल-मूत्र का त्याग नहीं करना चाहिए।
5. गूलर , शीशम, मेहंदी, बबूल , कीकर आदि के वृक्षों पर भी प्रेतों का वास होता है। रात के अंधेरे में इन वृक्षों के नीचे नहीं जाना चाहिए और न ही खुशबुदार पौधों के पास जाना चाहिए।
6. महिलाये माहवारी के दिनों में चौराहे के वीच रस्ते में न जाये उन्हें अपने से दाहिने रखे
7. कहीं भी झरना, तालाब, नदी अथवा तीर्थों में पूर्णतया निर्वस्त्र होकर या नग्न होकर नहीं नहाना चाहिए।
8. हाथ से छूटा हुआ या जमीन पर गिरा हुआ भोजन या खाने की कोई भी वस्तु स्वयं ग्रहण न करें।
9. अग्नि व जल का अपमान न करें। अग्नि को लांघें नहीं व जल को दूषित न करें।

उपाय :-
1 :- जब भी घर से बहार निकले इनके नमो का सुमिरन कर के घर से निकले।
अश्व्त्थामा बलिर्व्यासो हनुमान्श्च विभीषणः कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः l
सप्तैतान्सस्मरे नित्यं मार्कण्डेययथाष्टकं जीवेद् वर्षशतं साग्रमं अप मृत्युविनिष्यति ll
ये सात नाम है जो अजर अमर है और आज भी पृथ्वी पर विराजमान है
2 . अकाल मृत्यु निवारण के लिये
“नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।
लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।”
3 . राहु काल के समय यात्रा पर न जाये
4 . दिशाशूल के दिन यात्रा न करे
5 – शराब पीकर या तामसिक भोजन कर के धर्म क्षेत्र में न जाये
By:कौशल पाण्डेय

अकाल मृत्यु का भय नाश करतें हैं महामृत्युञ्जय—–
ग्रहों के द्वारा पिड़ीत आम जन मानस को मुक्ती आसानी से मिल सकती है। सोमवार के व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती की पूजा की जाती है। प्राचीन शास्त्रों के अनुसार सोमवार के व्रत तीन तरह के होते हैं। सोमवार, सोलह सोमवार और सौम्य प्रदोष। इस व्रत को सावन माह में आरंभ करना शुभ माना जाता है।
सावन में शिवशंकर की पूजा :—–
सावन के महीने में भगवान शंकर की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दौरान पूजन की शुरूआत महादेव के अभिषेक के साथ की जाती है। अभिषेक में महादेव को जल, दूध, दही, घी, शक्कर, शहद, गंगाजल, गन्ना रस आदि से स्नान कराया जाता है। अभिषेक के बाद बेलपत्र, समीपत्र, दूब, कुशा, कमल, नीलकमल, ऑक मदार, जंवाफूल कनेर, राई फूल आदि से शिवजी को प्रसन्न किया जाता है। इसके साथ की भोग के रूप में धतूरा, भाँग और श्रीफल महादेव को चढ़ाया जाता है।
क्यों किया जाता है महादेव का अभिषेक ????
महादेव का अभिषेक करने के पीछे एक पौराणिक कथा का उल्लेख है कि समुद्र मंथन के समय हलाहल विष निकलने के बाद जब महादेव इस विष का पान करते हैं तो वह मूर्चि्छत हो जाते हैं। उनकी दशा देखकर सभी देवी-देवता भयभीत हो जाते हैं और उन्हें होश में लाने के लिए निकट में जो चीजें उपलब्ध होती हैं, उनसे महादेव को स्नान कराने लगते हैं। इसके बाद से ही जल से लेकर तमाम उन चीजों से महादेव का अभिषेक किया जाता है।
‘मम क्षेमस्थैर्यविजयारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थं सोमव्रतं करिष्ये’
इसके पश्चात निम्न मंत्र से ध्यान करें-
‘ध्यायेन्नित्यंमहेशं रजतगिरिनिभं चारुचंद्रावतंसं रत्नाकल्पोज्ज्वलांग परशुमृगवराभीतिहस्तं प्रसन्नम्।
पद्मासीनं समंतात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्रकृत्तिं वसानं विश्वाद्यं विश्ववंद्यं निखिलभयहरं पंचवक्त्रं त्रिनेत्रम् ॥
ध्यान के पश्चात ‘ऊँ नम: शिवाय’ से शिवजी का तथा ‘ऊँ नम: शिवायै’ के अलावा जन साधारण को महामृत्युञ्जय मंत्र का जप करने से अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है । अत: शिव-पार्वती जी का षोडशोपचार पूजन कर राशियों के अनुसार दिये मंत्र से अलग-अलग प्रकार से पुष्प अर्पित करें।
राशियों के अनुसार क्या चढ़ावें भगवान शिव को..????
भगवान शिव को भक्त प्रसन्न करने के लिए बेलपत्र और समीपत्र चढ़ाते हैं। इस संबंध में एक पौराणिक कथा के अनुसार जब 88 हजार ऋषियों ने महादेव को प्रसन्न करने की विधि परम पिता ब्रह्मा से पूछी तो ब्रह्मदेव ने बताया कि महादेव सौ कमल चढ़ाने से जितने प्रसन्न होते हैं, उतना ही एक नीलकमल चढ़ाने पर होते हैं। ऐसे ही एक हजार नीलकमल के बराबर एक बेलपत्र और एक हजार बेलपत्र चढ़ाने के फल के बराबर एक समीपत्र का महत्व होता है।
मेष:-ऊँ ह्रौं जूं स:, इस त्र्यक्षरी महामृत्युछञ्जय मंत्र बोलते हुए 11 बेलपत्र चढ़ावें।
वृषभ: ऊँ शशीशेषराय नम: इस मंत्र से 84 शमीपत्र चढ़ावें।
मिथुन: ऊँ महा कालेश्वराय नम: (बेलपत्र 51)।
कर्क: ऊँ त्र्यम्बकाय नम: (नील कमल 61)।
सिंह: ऊँ व्योमाय पाय्र्याय नम: (मंदार पुष्प 108)
कन्या: ऊँ नम: कैलाश वासिने नंदिकेश्वराय नम:(शमी पत्र 41)
तुला: ऊँ शशिमौलिने नम: (बेलपत्र 81) वृश्चिक:
ऊँ महाकालेश्वराय नम: ( नील कमल 11 फूल)
धनु: ऊँ कपालिक भैरवाय नम: (जंवाफूल कनेर108)
मकर : ऊँ भव्याय मयोभवाय नम: (गन्ना रस और बेल पत्र 108)
कुम्भ: ऊँ कृत्सनाय नम: (शमी पत्र 108)
मीन: पिंङगलाय नम: (बेलपत्र में पीला चंदन से राम नाम लिख कर 108)
सावन सोमवार व्रत नियमित रूप से करने पर भगवान शिव तथा देवी पार्वती की अनुकम्पा बनी रहती है।जीवन धन-धान्य से भर जाता है।
सभी अनिष्टों का भगवान शिव हरण कर भक्तों के कष्टों को दूर करते हैं।

 ग्रहशांति और प्रोग्रेस के लिए कुछ सरल उपाय
आचार्य वराहमिहिर ने अपने प्रस‍िद्ध ग्रंथ ‘वराह संहिता’ में ग्रह पीड़ा निवारण के लिए रत्न धारण करने पर बल दिया है। दीर्घकालीन एवं असाध्य रोगों के लिए ‘रुद्रसूक्त’ का पाठ या ‘महामृत्युंजय’ का जाप कराना भी शुभ फल देने वाला होता है।
1. जब सूर्य जन्म कुंडली की बुरी स्थिति में पड़ा हो और हानिकारक हो रहा हो, जैसे दिल की बीमारी, शासकीय कार्यों में परेशानी, आंखों में कष्ट हो, पेट संबंधी बीमारियां हो, हड्डियों में तकलीफ होती है, उस समय गुड़ का दान करना, गेहूं का दान, लाल रंग की वस्तुओं का दान, तांबे का दान एवं यज्ञ और हवन करना लाभप्रद, शुभ होगा। संकट कम होंगे। रात्रि के समय आग को दूध से बुझाने से अग्निरूपी सूर्य को उसके मित्र दूधरूपी चंद्रमा की सहायता प्राप्त होगी तथा अनिष्ट ग्रह की शांति में सहयोग मिलेगा।
2. यदि चंद्रमा के कारण कष्ट हो रहा है, माता बीमार है, मानसिक चिंता, मानसिक निर्बलता हो, फेफड़ों में रोग हो अथवा धन का नाश हो रहा है, तो चांदी को बहते पानी में बहा देने से चंद्र संबंधित कष्टों का निवारण करने वाला होगा।
4. यदि मंगल के कारण कष्ट है तो मीठी रोटी (गुड़ की) बनाकर दान करें। रेवड़ी और बताशे पानी में बहाएं तथा हनुमान ही को चोला चढ़ाएं, झंडा चढ़ाएं।
5. बुध ग्रह के कारण परेशानी हो रही है, तब कौड़ियों को जलाकर उस राख को उसी दिन नदी में बहाएं। तांबे के सिक्के में छेद करके (छिद्र) नदी में या बहते पानी में डालें। साबुत मूंग, पन्ना आदि दान करें। फिटकरी पीसकर उससे मंजन करें, ग्रह निवारण होगा।
6. जब गुरु अनिष्टकारी हो तो घर के हर सदस्य से एक-एक मुद्रा इकट्ठा कर मंदिर में गुप्त दान नियमित रूप से करें। गुड़, हल्दी, आटे में मिलाकर ब्रहस्पतिवार के दिन गाय को खिलाएं। चने की दाल, केशर, सोना आदि दान करें। लड्डूगोपाल की पूजा करें।
7. यदि शुक्र अनिष्टकारी हो तो पशुओं को चारा खिलाएं, गौदान करें। घी, कपूर, सफेद मोती, दही का दान करें। गाय को अपने भोजन से निकालकर खाना दें, तब ही स्वयं भोजन करें।
8. शनि के अनिष्ट फल दूर करने के लिए तेल में अपनी छाया को देखकर तेल दान करें। काली उड़द, लोहा, तेल से बनी वस्तु (खाद्य पदार्थ), चमड़ा, पत्थर, शराब, स्प्रिट आदि का दान करें। कौओं को अपने खाने में से कुछ भा‍ग खिलाएं। काले कुत्ते को मीठी रोटी या गुड़ खिलाएं। चींटियों को काले तिल में गुड़ मिलाकर डालें।
9. यदि राहु के कारण अनिष्टकारी स्थिति बन रही है तो नारियल को नदी में बहाएं। मूली का दान करें। कोयला नदी में बहाएं। सफाई कर्मचारी को रुपए, कपड़े व अनाज का दान करें।
10. जन्म पत्रिका में केतु अनिष्टकारी हो तो कुत्ते को भरपेट भोजन करवाएं। केतु की दशा में पुत्र का व्यवहार बदल जाता है अत: मंदिर में अन्न, वस्त्र, कम्बल आदि का दान करें।
11. आर्थिक स्‍थिति सुदृढ़ करने के लिए, गृह क्लेश शांत करने हेतु पंढेरी (जहां पीने का पानी रखा जाता है) पर प्रतिदिन शाम को शुद्ध घी का दीपक रखकर ईश्वरीय एवं पितरों से अज्ञानतावाश हुए अपराधों के लिए क्षमा-प्रार्थना करें।
प्रतिदिन गणपति को लाजा (खील) चढ़ाने से भी रोजगार में वृद्धि होती है।
प्रतिदिन सूर्योदय के समय अर्घ्य देने से शीघ्र भाग्योदय होता है।
प्रतिदिन गणेशजी को दूर्बा अर्पित करने से शीघ्र भाग्योदय होता है।
प्रतिदिन एक माह तक सप्तधान्य का चूरा और गुड़ मिलाकर काली चींटियों को डालना क्लेश मुक्तिकारक होता है।

 ऎसे टालें दुर्घटना के योग
 by: Astro Saathi
वाहन के साथ किसी भी प्रकार की दुर्घटना होने की आशंका हमेशा बनी रहती है, भले ही दुर्घटना न हो, पर भय तो बना ही रहता है। कई बार छोटी दुर्घटनाएं होकर कोई बडी बला टल जाती है, तो कभी छोटी दुर्घटना भी जानलेवा साबित हो जाती है। यहां हम कुछ ऎसे सरल किन्तु अत्यन्त अपयोगी उपाय बता रहे हैं जिनका प्रयोग करने से दुर्घटना के योग को टाला जा सकता है अथवा घातक परिणामों से मुक्ति मिल सकती है। पहला- यह एक ऎसा सरल उपाय है जिसकेप्रयोग आप सुनिश्चित लाभ की अपेक्षा कर सकते हैं। इस प्रयोग के अन्तर्गत गुरूपुष्य नक्षत्र में शुभ मुहूर्त में निकाली गई अपामार्ग नामक पौधे की जड ले लें। इस पौधे को लटजीरा,आंधाझाडा इत्यादि नामों से भी पुकारा जाता है। इस जड को एक फिटकरी के टुकडे एवं एक कोयले के टुकडे के साथ एक काले वस्त्र में बांधकर उससे वाहन के चारों ओर दाहिने घूमते हुये 7 चक्कर लगायें। यह एक प्रकार का उसारा करने के समान है। इसके पश्चात इस पोटली को वाहन मे कहीं रख दें। ऎसा करने से वाहन दुरात्माओं से रक्षित रहता है तथा उसकी दुर्घटनाओं से भी रक्षा होती है।
दूसरा- यह एक यंत्र प्रयोग है। इस यंत्र निर्माण के पश्चात इसे सिद्ध करके अपने वाहन में अथवा अपने पास रखा जाए तो दुर्घटनाओं से बचा जा सकता है। अगर आपका वाहन चार पहिया है तो इसे डेशबोर्ड पर रखने की व्यवस्था करें। अगर दोपहिया वाहन है तो अपने पर्स में रखें। इस यंत्र का प्रारूप आगे दिया गया है। चूंकि किसी भी दुर्घटना से रक्षा करने वाले मारूति नन्दन श्री हनुमानजी हैं, अत: इस यंत्र का लेखन मंगलवार अथवा शनिवार को करें। अगर शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार अथवा शनिवार को करें तो अधिक प्रभावी रहेगा। इसके लिये आपको केशर को पानी में घोलकर स्याही का निर्माण करना पडेगा। लिखने के लिये अनार की कलम की व्यवस्था करें। एक भोजपत्र की भी व्यवस्था करके रखें। जिस दिन आपको यंत्र का निर्माण करना है, उस दिन स्नान आदि करके स्वच्छ वस्त्र धारण कर लें। आवास में ही किसी एकान्त स्थान का चयन करें। दक्षिण को छोडकर किसी भी दिशा की तरफ मुंह करके बैठें। बैठने के लिये सूती अथवा ऊनी आसन का प्रयोग किया जा सकता है। एक बाजोट बिछायें। इसके ऊपर सवा मीटर लाल वस्त्र चार तह करके बिछायें। इसके ऊपर हनुमानजी की तस्वीर को स्थान दें। इसके समक्ष दीपक प्रज्वलित करें। अब आप यंत्र का प्रारूप बनायें। यंत्र निर्माण के समय हनुमानजी के मंत्र का जाप करते रहें। यंत्र लेखन के पश्चात इसे बाजोट पर हनुमानजी की तस्वीर के समक्ष रख दें। अब आपको हनुमानजी के किसी भी मंत्र की एक माला का जाप करना है। जाप के पश्चात हाथ जोडकर उठ जायें। जब तक दीपक जलता है, तब तक यंत्र को वहीं रखा रहने दें। दीपक ठण्डा हो जाये, इसके बाद यंत्र को उठा लें। तस्वीर को पूजास्थल में स्थान दें। बाजोट एवं आसन आदि भी समेट लें। अब आप किसी भी प्रकार से यंत्र को कार के डेशबोर्ड पर रखें। अगर दोपहिया वाहन है तो जेब में रखें। यह यंत्र आपके लिये रक्षा कवच का काम करेगा और आपको किसी भी प्रकार की दुर्घटना से बचा कर रखेगा।
तीसरा- इस प्रयोग को सम्पन्न करने वाला स्नान आदि से निवृत होकर, किसी भी शनिवार अथवा मंगलवार के दिन हनुमानजी के मंदिर जाकर उन्हें फूल-प्रसाद आदि अर्पण करें। तदुपरान्त उसी मंदिर में बैठकर हनुमानजी को श्रीराम श्रीराम नाम सुनायें। वह चाहे तो श्रीराम नाम की ग्यारह माला का जाप करें। इसके पश्चात अपने दाहिने हाथ से हनुमानजी के बायें पैर का सिंदूर ले ले। ध्यान रहे कि सिंदूर लेने हेतु अनामिका का प्रयोग करें। इस सिंदूर को एक कागज के मध्य में टीके की भांति लगा लें। उस कागज पर लगाये गये टीके के ऊपर की ओर श्रीरामदूतम् शरणं प्रपद्दे लिखें तथा टीके के नीचे की ओर भी श्रीराम दूतमं शरणम् प्रपद्दे लिखें। टीके के दोनों बाजुओं की तरफ अर्थात दायें-बायें श्रीराम दूताय नम: ऎसा लिखें। हनुमानजी के नाम से जडित इस यंत्र को वाहन में ड्राइवर के समक्ष ऊपर की ओर लगा दें। गाडी चालाने के पूर्व ड्राईवर इस यंत्र को अगरबत्ती लगाकर प्रणाम कर वाहन चलाना प्रारम्भ करे। ऎसा करने से वाहन श्रीहनुमानजी की कृपा से सुरक्षित रहता है। इस यंत्र को स्थापित करने वाला ड्राईवर गलत कार्यो से बचें अन्यथा लाभ की जगह हानि भी हो सकती है।
चौथा- वाहन को दुर्घटना से बचाने हेतु अनेक सरल प्रयोग सुझाए गए हैं। यह प्रयोग अत्यन्त ही सरल एवं प्रभावी है। इस प्रयोग के अन्तर्गत वाहन चालक व्यक्ति एक काले वस्त्र का चौकोर टुकडा लें। उसमें लगभग देा सौ ग्राम फिटकरी का एक टुकडा बांध दें। इस पोटली को वाहन के सामने की ओर किसी मजबूत डोरी से लटका दें। इसके प्रभाव से वाहन किसी भी दुर्घटना से रक्षित रहता है। एक अन्य प्रयोग में वाहन के सामने और पीछे की ओर किसी राक्षस का मुखौटा बनाने या लगाने से भी वाहन दुर्घटना से मुक्त रहता है। कुछ लोग वाहनों को दुर्घटना एवं बुरी नजर से बचाने के लिये उनके सामने की ओर जूता लटकाये रखते हैं। इसी प्रकार वाहन के सामने की ओर त्रिकोणाकार आकृति में काटे गये दो काले वस्त्रों को कोणीय रूप से लगाने से भी वाहन नकारत्मक ऊर्जा से दूर रहता है। भगवान शिव को विध्वंस का देव माना गया है किन्तु इन्हीं की कृपा से साक्षात मृत्यु की ओर जाता हुआ व्यक्ति भी पुन: जीवनदान पा जाता है, इसलिये जितने भी भारी चार पहिया वाहन के चालक हैं, उनमें से अधिकांश अपने डेशबोर्ड पर भगवान शिव की प्रतिमा अथवा तस्वीर लगाते हैं। इन चालकों का विश्वास होता है कि जो मारने वाला है वही बचाने वाला भी होता है। अनेक चालक अपने डेश बोर्ड पर हनुमानजी की तस्वीर अथवा प्रतिमा को स्थान देते हैं। इनमें से किसी को अथवा जिन्हें आप मानते हैं, उनकी छोटी प्रतिमा अथवा तस्वीर को अवश्य स्थान दें। जब वाहन चलायें तो मानसिक रूप से इनका स्मरण अवश्य करें। दोपहिया वाहन चालक सिद्ध दुर्घटनाशक मारूति यंत्र अपनी शर्ट की जेब में रखें। इससे किसी भी दुर्घटना से रक्षा होगी। 

वाहन दुर्घटना क्यों होती है?-पं. ज्ञानेश्वर
>> Sunday, August 1, 2010


दुर्घटना और उससे होने वाले कष्ट की कल्पना करके मान कांप जाता है। दुर्घटना क्यों होती है? चालक की लापहरवाही से या तेज गति से चलने के कारण होती है। लेकिन ज्योतिष के अनुसार दुर्घटना तब होती है जब कुंडली में अरिष्ट योग हों या अशुभ दशा चल रही हो। इसके अतिरिक्त अधोलिखित योग हों और इन योग कारक ग्रहों की दशा-अन्तर्दशा जब आती है तभी दुर्घटना होती है। ज्योतिष योग इस प्रकार हैं-
1. चतुर्थेश और शनि की युति छठे भाव में हो तो वाहन से मृत्यु होती है।
2. लग्नेश निर्बल हो एवं शनि आठवें भाव में पापग्रह से युत या दृष्ट हो।
3. मंगल चौथे भाव में हो एवं सूर्य दसवें भाव में हो तो भी वाहन से दुर्घटना होती है।
4. चन्द्र और मंगल केन्द्र में स्थित हो या आठवें भाव में स्थित हो या निर्बल चन्द्र चौथे भाव में पापग्रह से दृष्ट हो तो दुर्घटना से मृत्यु तुल्य कष्ट या मृत्यु होती है।
5. चतुर्थेश अर्थात्‌ चौथे भाव का स्वामी और अष्टमेश अर्थात्‌ आठवें भाव की युति कुंडली में हो तो भी वाहन दुर्घटना से मृत्यु तुल्य कष्ट होता है।
    इन पांच योगों को कुंडली में देख लें और जो योग कुंडली में मिलें उन योगकारक ग्रहों की जब दशा-अन्तर्दशा-प्रत्यन्तर दशा आती है तब यह दुर्घटना योग घटित होता है। गोचर में भी यह युतियां या योग हों तो निश्चित रूप से दुर्घटना होती है।(ज्योतिष निकेतन सन्देश अंक 29 से साभार) 

अपना भविष्य खुद जाने :व्यक्ति का चेहरा एक खुली किताब होता है, : स्त्रियों में तिल का फल:होंठों को देखकर :

व्यक्ति का चेहरा एक खुली किताब होता है
  उज्जैन। हम जब भी किसी व्यक्ति से मिलते हैं तो सबसे पहले उसके चेहरे पर हमारी नजर जाती है। यदि उस समय चेहरे के खास अंगों की बनावट पर ध्यान दिया जाए तो तुरंत ही उस व्यक्ति के चरित्र से जुड़ी बातें समझी जा सकती हैं। चेहरे के खास अंग जैसे नाक, सिर, आंखें, पलक, कान, भौंहें आदि। इन अंगों की बनावट और स्थिति जैसी होती है व्यक्ति का स्वभाव भी वैसा ही होता है। इस संबंध में ज्योतिष शास्त्र में कई महत्वपूर्ण बातें बताई गई हैं।
 ज्योतिष में शरीर के लक्षणों के देखकर व्यक्तित्व और भविष्य बताने की विधि को सामुद्रिक विद्या कहते हैं। ये ज्योतिष का अभिन्न अंग है। सामुद्रिक विद्या के अनुसार मनुष्य के सिर से लेकर पैर तक हर अंग के अपने कुछ लक्षण होते हैं, उसकी बनावट, आकार और रंग हमारे व्यक्तित्व के रहस्यों पर तो रोशनी डालते ही हैं, साथ ही भविष्य भी बताते हैं। किसी भी व्यक्ति के चेहरे को देखकर ये आसानी से बताया जा सकता है कि वो व्यवहार, आचार-विचार और कार्यक्षेत्र में कैसा है।

सिर की बनावट देखकर समझें ये बातें...
- जिन लोगों के सिर की लंबाई ज्यादा हो और चौड़ाई कम हो ऐसे लोग जीवन में सभी सुविधाएं प्राप्त करते हैं।
- जिस व्यक्ति का सिर आकार में मध्यम रहता है वे लोग पैसों के मामले में काफी भाग्यशाली रहते हैं।
- यदि किसी व्यक्ति का सिर अन्य लोगों की अपेक्षा अलग दिखता है, बड़ा और चौड़ा होता है वे लोग जीवन में काफी परेशानियां का सामना करते हैं।
बालों को देखकर जानें ये बातें
- जिस व्यक्ति के बाल काले और मुलायम और सुंदर होते हैं वे धनी होते हैं और सभी सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं।
- जिन लोगों के बाल पतले होते हैं वे लोग अच्छे स्वभाव के लोग होते हैं।
- रूखे और सख्त बाल वाले लोग बहादुर होते हैं, लेकिन वे संकुचित मानसिकता वाले होते हैं।
- एकदम सूर्ख रंग के बाल वाले लोग गरीब और परेशान होते हैं। जबकि सुनहरे बाल वाले लोगों का जीवन स्तर मध्यम रहता है।
भौंहें देखकर जानिए ये बातें
- सुंदर और बारिक भौंहे वाले व्यक्ति धन संबंधी कार्यों में विशेष लाभ कमाने वाले होते हैं।
- जिन लोगों की दोनों भौंहे आपस में मिली हुई होती हैं वे अन्य लोगों की अपेक्षा अधिक चतुर और चालक होते हैं।
- यदि किसी व्यक्ति की भौंहों के बाल रूखे और बेजान दिखाई देते हैं वे लोग जीवन में धन की कमी का सामना करते हैं। इन का लोगों का व्यवहार काफी सख्त होता है।
- ऐसे लोगों को जीवन में पूर्ण ऐश्वर्य मिलता है, जिनकी भौंहें चौड़ी होती हैं और आपस में मिलती नहीं हैं।
आंखें देखकर जानिए ये बातें
- यदि किसी व्यक्ति की आंखें बिल्ली की आंखों के समान दिखाई देती हैं तो वह इंसान दुराचारी हो सकता है।
- जिन लोगों की आंखों में सूर्ख रंग के डोरे दिखाई देते हैं वे लोग जीवन में पूर्ण सुख-सुविधाएं प्राप्त करते हैं। यदि ऐसी आंखें किसी स्त्री की हों तो वह काफी अधिक धन लाभ अर्जित करती हैं।
- जिन लोगों की आंखों में हमेशा गुस्सा दिखाई देता है वे लोग बहादुर होते हैं और साहस के बल पर कार्य पूर्ण कर लेते हैं।
कान देखकर जानिए ये बातें
- जिन लोगों के कान सामान्य आकार से अधिक लंबे दिखाई देते हैं वे लोग लंबी उम्र जीते हैं और इन्हें काफी पैसा भी प्राप्त होता है।
- लंबे और पतले कान वाले लोग अच्छे स्वभाव वाले और समाज में मान-सम्मान प्राप्त करने वाले होते हैं।
- जिन लोगों के कान पर अधिक बाल दिखाई देते हैं वे मेहनत करते हैं लेकिन उचित फल प्राप्त नहीं कर पाते हैं।
- छोटे कान वाले लोगों का जीवन सामान्य होता है। यदि ये लोग अधिक मेहनत करते हैं तो सकारात्मक फल अवश्य प्राप्त होते हैं।
नाक देखकर जानिए ये बातें
- जिन लोगों की नाक ऊंची और बड़ी होती है वे भाग्यशाली होते हैं और जीवन में कई उपलब्धियां हासिल करते हैं।
- ऐसे लोग बहुत समझदार और किस्मत के धनी होते हैं, जिनकी नाक तोते की चोंच के समान होती हैं। ऐसी तीखी नाक वाले लोग दिमागी कार्य में पारंगत होते हैं।
- जिन लोगों की नाक छोटी सी दिखाई देती है वे लोग स्वभाव से अच्छे होते हैं। जबकि छोटी और मोटी नाक वाले लोगों को कम अक्ल होते हैं।
पलक देखिए और जानिए ये बातें
- यदि किसी व्यक्ति की पलक पर बाल बहुत कम हैं तो वह इंसान शौकिन मिजाज होता है। ऐसे लोग शान और शौकत में जीवन व्यतीत करते हैं।
- ऐसे लोग गरीब होते हैं जिन लोगों की पलक के बाल सख्त होते हैं। इन लोगों को जीवन में काफी परिश्रम करना पड़ता है, लेकिन सकारात्मक फल प्राप्त नहीं हो पाता है।


क्या बोलता है आपका चेहरा
वंदना अग्रवाल
चौकोर चेहरा, गोल चेहरा, तिकोना चेहरा, मोटी नाक, तीखी नाक, वगैरह-वगैरह के बारे में आपने किस्से तो बहुत सुने होंगे। सौंदर्य के पैमाने पर भी इन्हें कसा होगा। पर शायद ही इनके ज्योतिषीय पक्ष को समझने की कोशिश की हो। आइए जानते हैं चेहरे का कौन-सा भाग व्यक्तित्व के किस पक्ष से रू-ब-रू कराता है। बता रही हैं वंदना अग्रवाल
आपके चेहरे का हर हिस्सा आपके बारे में बयां करता है। चेहरे के विभिन्न अंगों की मदद से आप सामने वाले व्यक्ति की पर्सनेलिटी को जान सकती हैं। चेहरे का कौन-सा हिस्सा क्या कहता है, आइए जानें:
चेहरे का आकार
सरकुलर चेहरा चंद्रप्रधान होता है। ऐसे चेहरे वाले लोग कल्पनाशील, घरेलू, आलसी और ऊर्जा की कमी महसूस करने वाले होते हैं। चौकोर चेहरे वाले लोग मजबूत और आक्रामक प्रवृत्ति के होते हैं। पृथ्वी तत्व की प्रधानता वाले ये लोग शारीरिक क्षमता और शक्ति पर भरोसा करते हैं। वहीं आयताकार चेहरे वाले लोग ईमानदार और डिप्लोमेटिक स्वभाव के होते हैं। नेतृत्व क्षमता से भरपूर ये लोग अच्छे पदों पर रहते हैं और राजनीति में सफलता प्राप्त करते हैं। तिकोने चेहरे वाले लोग गुस्सैल स्वभाव के होते हैं। ऐसे लोग अक्सर प्रतिभा की कमी से भी जूझते हैं। इनके हिस्से में व्यवहारकुशलता भी कम ही आती है। इसके विपरीत ठुड्डी की ओर से नुकीले चेहरे वाले लोग खुशमिजाज होते हैं। कभी-कभी ऐसे लोग हाइपरएक्टिव भी दिखते हैं।
माथे की रूपरेखा
माथे का सबसे ऊपरी हिस्सा यानी हेयरलाइन पूर्वजों के प्रति व्यक्ति की आस्था बताता है। हेयरलाइन बताती है कि व्यक्ति अपने पूर्वजों के काम को आगे बढ़ाने में विश्वास रखता है और उनकी शिक्षा-दीक्षा का सम्मान करता है। हेयर लाइन के बाद आने वाला टॉप फोरहेड यानी ऊपरी माथा यह बताता है कि व्यक्ति कितनी यात्राएं करेगा। यदि रेखाएं सीधी हैं, टूटी-फूटी नहीं हैं, तो जीवन में इन यात्राओं के सार्थक परिणाम मिलते हैं। इसके विपरीत यदि रेखाएं टूटी-फूटी हैं, तो सही परिणाम नहीं मिलते। व्यक्ति को शारीरिक हानि भी उठानी पड़ सकती है। सेंट्रल फोरहेड से करियर के बारे में पता चलता है। यह यदि स्पष्ट है और वहां पर आयु के अनुरूप सीधी रेखाएं हैं, तो व्यक्ति करियर के प्रति बहुत ज्यादा उत्साही होता है। करियर को जीवन में सर्वाधिक महत्व देता है। यदि माथा अंदर की ओर धंसा हुआ है, तो व्यक्ति करियर के प्रति उदासीन होता है।
होंठों का आकार
अपर लिप जीवन में स्नेह प्रदर्शित करता है। यदि यह लंबा है, तो जीवन में स्नेह की कमी रहती है। यदि यह चेहरे के अनुरूप बैलेंस है, तो व्यक्ति को भरपूर स्नेह मिलता है। यदि होंठ के दोनों ओर गड्ढे बनते हैं, तो मनुष्य के जीवन में स्नेह की अधिकता रहती है।
नाक का आकार
नाक की टिप से किसी भी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का पता लगाया जा सकता है। अगर यह संतुलित है, तो व्यक्ति आर्थिक रूप से समृद्ध होता है।
क्या कहती हैं भौंहें और पलकें
भौं से भाई-बहन-परिवार के बारे में पता चलता है। यदि भौं उठे हुए और नुकीले हों, तो भाई-बहनों की संख्या कम होती है। भाई-बहनों से संबंध भी अच्छे नहीं होते। घनी पलकें व्यक्ति के संपत्तिवान होने की निशानी होती हैं।
आंखों की भाषा
यदि पुतलियां आंख के ऊपरी हिस्से को अधिक छूती हैं, तो व्यक्ति के व्यवहार में एकरूपता का अभाव होता है। ऐसे लोग विश्वसनीय नहीं होते। जिन लोगों की पुतली आंख के निचले हिस्से को ज्यादा छूती है, वे लोग निष्ठुर होते हैं। इसीलिए फिल्मों में ऐसी आंखों वाले लोगों को अधिकांशत: विलेन के रोल के लिए चुना जाता है। अगर पुतली आंख के आकार के मुकाबले बड़ी है, तो व्यक्ति अपनी भावनाओं को छुपा नहीं पाता। ऐसे लोग एक्स्ट्रोवर्ट होते हैं। छोटी पुतली वाले लोग गोपनीय प्रवृत्ति के होते हैं। दोनों आंखों के बीच अनुपात से ज्यादा दूरी वाले लोग खर्चीले स्वभाव के होते हैं।
(ज्योतिषाचार्य डॉ. दत्तात्रेय होस्केरे से बातचीत पर आधारित)

  चेहरे में छुपा तकदीर का राज, जानें अपनी किस्मत को
आईबीएन-7
नई दिल्ली। चेहरा व्यक्ति की पहचान होता है। किंतु अच्छा या बुरा चेहरा होना उसकी खूबसूरती या बदसूरती से नियत नहीं होता, बल्कि अच्छे या बुरे कर्म भी सुन्दर चेहरे को बदसूरत और बिगड़ी सूरत को खूबसूरत बनाने में निर्णायक होते हैं। यही चेहरा मन के भावों को उजागर भी कर देता है। किंतु कुछ लोग चेहरे के भावों को छुपाने की कला में भी महिर होते है और अपने स्वार्थ या मंशा को पूरा करने के लिए नकली चेहरे को असली चेहरे के पीछे छुपा लेते हैं। व्यावहारिक जीवन के नजरिए से यही बात अनेक मौकों पर नुकसान या परेशानी का कारण भी बन जाती है।
वहीं दूसरी तरफ व्यक्ति के मन में भी खुद का जीवन कैसा होगा, यह जिज्ञासा भी रखता है। हिन्दू धर्म शास्त्र में लिखी कुछ रोचक बातें ऐसी ही जिज्ञासा को शांत करने और अंजान पुरुष से व्यवहार करने के सूत्र बताती है। इन बातों में अलग-अलग सूरत वाले पुरुषों के गुण व स्वभाव बताए गए हैं।
हिन्दू धर्म ग्रंथ भविष्यपुराण के मुताबिक जब भगवान शिव ने विवाद के बाद पुत्र कार्तिकेय द्वारा लिखे गए लक्षण शास्त्र को समुद्र में फेंक दिया, तब कार्तिकेय स्वामी के निवेदन पर ब्रह्मदेव ने पुरुषों की मुख से पहचान के लक्षणों को उनको फिर से स्मरण कराया।
यहां जानते हैं पुरुषों के मुख से जुड़ी ऐसी ही रोचक बातें -
- चन्द्रमा की रोशनी की तरह चमकदार और शांत चेहरे वाला भला और धर्मात्मा पुरुष होता है।
- वानर या बकरें जैसे मुख वाला पुरुष धनवान होता है।
- खूबसूरत और तेजयुक्त हाथी के मुख की तरह भरे चेहरे वाला राजा यानि राजसी स्वभाव का होता है।
- सूंड के आकार जैसे लम्बे चेहरे वाला पुरुष बदकिस्मत होता है।
- बदसूरत, टेढ़ा, टूटा और शेर की तरह चेहरा चोर व्यक्ति की पहचान है।
- लंबा, छोटा और कुटील भाव से भरे मुख वाला पुरुष गरीब और पापी होता है।
- औरत जैसा, चौकोर चेहरे वाला पुरुष पुत्रहीन होता है।
- जिसके गाल कमल जैसे लाल और चमकदार हो वह धनवान और किसान होता है।
- हाथी, बाघ या शेर जैसे गालों वाला पुरुष सभी सुख और संपत्तियों का मालिक होता है।

स्त्रियों में तिल का फल
स्त्री जातक व तिल
तिलो का शरीर पर अपना अलग ही महत्व होता हैं प्रस्तुत लेख मे हम स्त्री जातक के शरीर मे विभिन्न हिस्सो पर पाये जाने वाले तिलो के विषय मे जानकारी दे रहे हैं जिनसे स्त्री के आचरण,व्यवहार,विचार व भाग्य इत्यादि का पता लगाया जा सकता हैं |

1)स्त्री के सिर के मध्य भाग मे तिल उसे पति का पूर्ण सुख पाने वाली,शुद्ध हृदय व सम्पूर्ण ऐश्वर्या प्राप्त करने वाली बनाता हैं | सिर की दायीं ओर का तिल समाज मे प्रतिष्ठित परंतु उदास स्वभाव वाली स्त्री का होना बताता हैं जिसे विवाह के बाद विदेश मे रहना पड़ता हैं तथा सिर के बाईं ओर का तिल उसे दुर्भाग्यशाली बनाता हैं |
2)जिस स्त्री के ललाट पर काले रंग का तिल होता हैं वह पुत्रवान,सौभाग्यवान,धार्मिक स्वभाव व दयालु प्रवृति की होती हैं | ललाट की दायीं और तिल स्त्री के जन्म स्थान से दूर रहने वाली,अच्छे स्वभाव की स्त्री होना बताता हैं जिसे संतान कष्ट रहता हैं | ललाट के बीचोबीच तिल स्त्री को कला कुशल परन्तु कठोर वचन कहने वाली बनाता हैं | जबकि ललाट के बाईं और का तिल स्त्री को पति सुख मे कमी दर्शाता हैं |
3)स्त्री के भोहों के मध्य भाग मे तिल उसे सरकार से ऊंच पद का लाभ प्राप्त करवाता हैं अर्थात वह या उसका पति सरकारी नौकरी वाले होते हैं |किसी एक भोह मे बना तिल स्त्री के स्वभाव मे ओछेपन का प्रतीक होता हैं ऐसी स्त्री का विवाह बेमेल होता हैं |
4)स्त्री की आँखों के ऊपर या नीचे तिल होतो वह स्त्री अनुचित तरीके से धन संचय करने वाली तथा संतान विहीन होती हैं जो अपने स्वास्थ्य की सही से देखभाल नहीं करती हैं उसकी आयु भी कम होती हैं |जबकि स्त्री की आँख मे तिल पति की प्रियतमा होने की सूचना देता हैं |
5)स्त्री की दायीं ओर आँख के नीचे गाल पर तिल होतो स्त्री धार्मिक व सदाचारिणी होती हैं जिसे हर जगह मान समान व यश प्राप्त होता हैं जबकि बाईं ओर आँख के नीचे गाल पर तिल होतो ऐसी स्त्री अत्यधिक काम वासना से पीड़ित रहती हैं जिसके उसकी उम्र से छोटे कई प्रेमी होते हैं |
6)स्त्री के कान मे तिल उसके आभूषण प्रिया होने की सूचना देते हैं जबकि कान के नीचे तिल उसकी अन्य स्त्रीओ से शत्रुता के बारे मे बताते हैं |
7)स्त्री के नाक के अग्रभाग मे लाल रंग का तिल उसके सौभाग्यशाली व ऊंचाधिकारी की पत्नी होने का सूचक होता हैं |
8)स्त्री के मुख मे तिल उसके सुखी,सम्पन्न व सज्जन होने की सूचना देता हैं उपरी होंठ पर तिल स्त्री के शिक्षावान होने का संकेत देता हैं ऐसी स्त्री अच्छी वक्ता या शिक्षिका होती हैं |
9)स्त्री के बाएँ गाल मे काला तिल उसके ऐश्वर्या पूर्ण जीवन के बारे मे बताता हैं जो भोग विलास मे अधिक रुचि रखती हैं जबकि लाल तिल उसके मिष्ठान प्रिय होने के बारे मे बताता हैं तथा दायें गाल पर तिल स्त्री को किसी असाध्य बीमारी होने के बारे मे बताता हैं |
10)स्त्री की ठोड़ी मे तिल उसके मिलनसार ना होने का पता बताता हैं जो किसी से भी घुलना मिलना पसंद नहीं करती हैं जिन्हे आम भाषा मे लजीली स्त्री कहते हैं |
11)स्त्री के कंठ मे तिल हो तो वह अपने घर मे हुकूमत चलाना पसंद करती हैं सब पर नियंत्रण रखना चाहती हैं |12)स्त्री के हृदय स्थान मे तिल सौभाग्य का प्रतीक होता हैं बाएँ स्तन पर लाल तिल होतो स्त्री के पुत्र जन्म बाद विधवा हो जाने का सूचक होता हैं काला तिल होतो उस स्त्री की मृत्यु किसी दुर्घटना से होती हैं जबकि दायें स्तन मे तिल स्त्री की कन्या संतान की अधिकता बताता हैं |
13)स्त्री की बाईं भुजा मे तिल उसके कला,काव्य,अभिनय,संगीत इत्यादि के क्षेत्र से जुड़ा होने का प्रतीक होता हैं जिससे उसे धन व यश प्राप्त होता हैं |
14)स्त्री के गुप्त स्थान के दायीं ओर तिल होतो वह राजा अथवा ऊंचाधिकारी की पत्नी होती हैं जिसका पुत्र भी आगे चलकर अच्छा पद प्राप्त करता हैं |
15)स्त्री की जंघा पर तिल उसके यात्रा व भ्रमण प्रिया होने की सूचना देते हैं
16)स्त्री के पाँव के टखने मे तिल उसकी दरिद्रता भरे जीवन की सूचना देता हैं |
 मुखा कृति बिज्ञान
दिल की बात कहता है चेहरा

मुख अर्थात् मुख्य एक शरीर में सर्वाधिक चेतनामय, ऊर्जामय, ज्ञानमय व प्रज्ञामय भाग व्यक्ति का मुख ही है। आंख, कान, नाक व मुख सहित मस्तिष्क के सभी ज्ञानमय व स्मृति केन्द्रों का संरक्षक (चेहरा) ही तो है। ब्रह्मा जी के चार मुख, शिवजी के पांच मुख, रावण के दस सिर (दसग्रीव) भगवान दत्तत्रेय के तीन मुख आदि मुख के विशिष्ट गुणों की व्याख्या करते हैं।
‘ब्राह्मणों मुखम आसीत्’ अर्थात् परमात्मा के मुख से ही ज्ञानवान, प्रज्ञामय संस्कारी ब्राह्मणों का आविर्भाव हुआ। अर्थात देखने की क्षमता, सुनने की पात्रता, श्वांस लेने की योग्यता व आहार करने की पवित्रता की प्राप्ति जिस मुख की मदद से मनुष्य करता है, वह (मुख) सर्वश्रेष्ठ अंग ब्रह्म तुल्य है। देखना अर्थात ‘दृष्टा’, सुनना अर्थात श्रोता, प्राणायाम अर्थात योग शिक्षा तथा आहार दक्षता यह सभी आध्यात्मिक गुण चेहरा अर्थात मुखमंडल देखकर ही आप जान सकते हैं।
‘मुखाकृति विज्ञान’ में महारथ हासिल कर आप निम्न बातों का पता आसानी से लगा सकते हैं।
1 बुद्धिमत्ता या मूर्खता
2 स्मरण शक्ति कमजोर या तेज
3 दयालुता या कठोरता
4 साहसी या दब्बू
5 दृढ़ निश्चयी या लचीला स्वभाव
6 देशप्रेमी या देशद्रोही
7 धनवान या निर्धन
8 सामाजिक या समाज विरोधी
9 स्वस्थ या बीमार
इन सभी गुणों व अवगुणों को आप चेहरे पर आंख, मस्तक, भौंहे, नाक, कान, पलकें, होंठ, जबड़ा, ठोड़ी आदि देखकर जान सकते हैं।
प्रत्येक मनुष्य की मुखाकृति में आप यदि ध्यान से देंखे तो किसी न किसी की झलक आपको दिखाई देगी। किसी के चेहरे पर शेर जैसा प्रभाव दिखाई देता है, तो कोई वानर जैसे मुख वाला होता है। कोई भेड़, तोता, गिद्ध, भैंसा, लोमड़ी आदि अनेक स्वभाव व चेहरे जैसा रूप वाला होता है। संक्षेप में मुखाकृति विज्ञान के रहस्य आपके ज्ञानवर्धन के लिये निम्न प्रकार है।
मुख के तीन भाग:
1 मस्तक या ललाट
2 भौंहों से नाक के अग्र भाग तक
3 नाक के अग्र भाग से बेड़ी तक
1 मस्तक या ललाट (पहला भाग)- इस भाग में भौंहों से ऊपर मस्तक या ललाट का भाग होता है। यह भाग यदि बड़ा हो या उन्नत हो तो व्यक्ति बुद्धिमान, तेज स्मृति वाला, नई बातों को सीखने वाला, काव्य व योग का ज्ञाता है। जीवन की समस्याओं का समाधान बौद्धिक बल से सोच-विचार कर लेते हैं।
2 भौंहों से नासिका तक (द्वितीय भाग)- भौंहों से नासिका के अग्र भाग तक यह भाग होता है। भौंहे, आंखें, नाक, कान व कनपटी आदि अंग इस भाग में आते हैं। नासिका व आंखों का सर्वाधिक महत्व होता है। यदि यह दोनों अंग विकसित, उन्नत व शुभ हो तो व्यक्ति स्वाभिमानी और भावेश को नियंत्रण में रखने की सामर्थ्य होती है। आर्थिक स्थिति, व्यापार या नौकरी में क्या शुभ है जाना जा सकता है। जातक कितना भाग्यवान है। जीवन में संघर्ष से जूझने की कितनी शक्ति है, नासिका व आंखों की बनावट से जाना जाता है।
जिनके प्रथम खंड से दूसरा खंड अधिक विकसित व लंबा होता है, वे हठी, दृढ़ निश्चय वाले, बाधाओं का डटकर सामना कर सफल होते हैं। यदि प्रथम खंड से दूसरा खंड छोटा हो त व्यक्ति पराजित होकर अवसाद में आने वाला, उचित निर्णय लेने में अशक्त होता है। कभी दोगला स्वभाव भी देखा जाता है। कभी शांत तो कभी उग्र रूप में दिखाते हैं।
3 नाक से ढोढ़ी तक (तीसार भाग)- नासिका के उग्रभाग से ढोड़ी तक का भाग इस खंड में आता है। इस भाग में मूंछों का स्थान, होंठ, कपोल, जबड़ा व ठुड्डी आदि भाग आते हैं। मुख का यह भाग 50 वर्ष की आयु के बाद जातक का जीवन कैसे चलेगा, यह जाना जा सकता है। वर्गाकर व गोलाई यदि दृढ़ता युक्त हो तो शुभ माने जाते हैं। यदि ठोड़ी पीछे की ओर हटी हुई हो या नुकीली हो तो वृद्धावस्था में स्वयं को परिस्थितियों के अनुकूल नहीं बना पाते हैं। आगे की ओर निकली हुई ठोड़ी व वर्गाकर ठोड़ी वाले जातक जिद्दी आत्मविश्वासी व तर्क युक्त तथा परिस्थितियों के अनुकूल जीने वाले होते हैं। जिनका यह भाग पहले भाग के बराबर या अधिक लंबा हो वे वृद्धावस्था में सुखी जीवन जीते हैं। यदि पहला भाग तीसरे भाग से अधिक लंबा हो तो व्यक्ति अन्तर्मुखी व ध्यानमग्न होता है, यदि तीसरा भाग पहला भाग से लंबा हो

 भौहों को देखकर समझे व्यक्ति का स्वभाव

जब सताए जोड़ों का दर्द

एक लहसुन की चार कलियाँ छीलकर तीस ग्राम सरसों के तेल में डाल दें। उसमें दो ग्राम (आधा चम्मच) अजवाइन के दाने डालकर धीमी-धीमी आँच पर पकाएँ। लहसुन और अजवाइन काली हो जाए तब तेल उतारकर ठंडा कर छान लें। इस गुनगुने गर्म तेल की मालिश करने से हर प्रकार का बदन का दर्द हो जाता है। 

10 ग्राम कपूर, 200 ग्राम सरसों का तेल - दोनों को शीशी में भरकर मजबूत ढक्कन लगा दें। शीशी धूप में रख दें। जब दोनों एक सार मिलकर घुल जाए तब इस तेल की मालिश से नसों का दर्द, पीठ और कमर का दर्द और, माँसपेशियों के दर्द शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं।

Tuesday, June 3, 2014

कैसे पायें पढ़ाई में सफ़लता ? 20 Tips

The results of the board exams coming wave of pleasure race in which students generally are everywhere, some sad news on the news papers and TV channels are also front, and where the students do good numbers
Exam Tips in HindiSit up suicide due to mental pressure | This is a very serious matter because the first place we are in cases of student suicide |
Friends, said, "The more sweat shed in practice, the less blood will flow equally in war" |
वैसे आज के प्रतियोगिता भरे युग में, पढ़ाई करना और अच्छे नम्बरों से पास होना किसी लड़ाई से कम नहीं रह गया है | बात तो बहुत सीधी सी है कि अगर आपको ये लड़ाई जीतनी है तो इसके लिए पहले से रणनीति बनाने और उसके अनुरूप तैयारी करने Need |
आमतौर पर सही मार्गदर्शन के अभाव में विद्यार्थी ठीक ढ़ंग से तैयारी नहीं कर पाते और परीक्षा का समय नजदीक आते ही उनमें चिंता और घबराहट बढ़ने लगती है | किसी भी परीक्षा की तैयारी करने और सफल होने के कुछ सूत्र यहाँ दिए गए हैं |
Success formula
1.  the work habit of delaying release
Friends, if you really want to succeed, you must give up the habit of postponing tasks | task that is important to him at the right time | you may have heard  , "call the sleep today, today, now, moment Prly will be taken in, will Bhuri when "  | means that we work yesterday and today's work today must now |
But today's youth have given rise to a new couplet | pointing out that  "today, span, time to sleep the day before yesterday, to so early, just lying for years"  | friends on what the truth is, all of us know | why we should not work but all the necessary work in time to avert must |
2. Select the appropriate location for study
पढ़ाई करने के लिए एक उपयुक्त एवं शांत जगह का चुनाव करना बहुत ज़रूरी है | पढ़ाई का स्थान ऐसा होना चाहिए जहाँ पर पूरी एकाग्रता और शांत मन से बैठकर पढ़ा जा सके | यदि घर छोटा हो या घर में ऐसा कोई उपयुक्त स्थान ना हो तो घर a quiet place outside of a friend's house or a library (Library) would be better to go to Reading |
3. Create a time table for studies
जो भी विद्यार्थी सफल होना चाहता है उसके लिए आवश्यक है कि वह पढ़ाई के लिए निर्धारित किये गए समय की एक समय सारणी (Time Table) बनाएं | उस समय सारणी में हर विषय के लिए एक निश्चित समय आवंटित करें | एक सही समय सारणी बनाने पर Pay attention as you are right on every topic | Guys, just is not enough time to draw tables, it is important to follow |
4. Allow time for sports and recreation
Systemic development of a student (Comprehensive Development) is important for sports along with her studies and should give time for your entertainment | sports physical growth |
Indoors you Buddhivrdhk Games (Memory Improvement Games) can enjoy |
5. Divide large tasks into small parts
कोई भी बड़ा कार्य जब हम करने लगते हैं तो शुरुआत में बहुत कठिन और असंभव लगता है | लेकिन जब हम उसे छोटे छोटे टुकड़ों में बाँट देते हैं और तो वही काम आसान हो जाता है | इसी प्रकार पढ़ाई में भी बड़े Chapter या Formula को छोटे parts can be made easier by sharing | It is easy to read and interesting |
6. Know your energy level
दिन में अलग अलग समय पर हर व्यक्ति की शारीरिक और मानसिक उर्ज़ा का स्तर अलग हो सकता है | उदाहरण के तौर पर कुछ लोग सुबह के समय ज्यादा Fresh और Energetic महसूस करते हैं तो कुछ लोग शाम को या फिर रात के समय | कुछ लोगों को read up in the morning to late at night to read so much remember what happened | Fresh and Urghawan more so at the time you feel yourself, his studies at the time you Keep |
7. Take a rest pause between studies
While studying, your brain gets tired | Whenever you feel tired then rest pause (Short Break) make sure to | while studies usually after 30 to 40 minutes should get some rest |
8. Highlight the main points
Whenever you sit down to study, so always keep a Highlighter Pen | If you have any important names, date, location or sentence appears immediately take him to Highlight | a lot like this will help you when Revision |
9. Set Your Goals
जीवन में अपनी पढ़ाई के लक्ष्य निर्धारित कीजिये | आप कौन सा Chapter या किताब कितने दिनों में ख़त्म करना चाहते हैं, कौन से Subjects पर विशेष ध्यान देने की ज़रूरत है अथवा अपने मनपसंद कॉलेज में जाने के लिए कितने प्रतिशत अंकों की ज़रूरत होगी | इस प्रकार it is important to set goals for their studies | you every week, month, set a goal at the end of the school year without trepidation If exams are correctly |
10. All the senses (Senses) Include
Your five sense organs (ears, nose, eye, tongue and skin) in their studies of the possible use | printed in the book, look at pictures and charts etc. | Practical Lab if possible or subject by touching the associated model View | CD also comes with books nowadays | these CDs also helps greatly in understanding the subject |
11. Use the techniques Buddhivrdhk
If you Buddhivrdhk Techniques (Memory Improvement Techniques) know about or learned them from you, so please be sure to use them in their studies | The Techniques are very scientific and result oriented |
12. balanced diet
An old saying "As the grain, so the mind", meaning that the person eats the same food as his mind and body is made | it is very important that you take balanced diet | from cold drinks and junk foods like pizza and burgers Avoid | that you have the correct way of eating heavy breakfast, lunch and dinner, even lighter than the lighter bike | if possible only at dinner salad (Salad) and fluids (Liquids) Take |
13. Keep the body healthy
Because a healthy mind resides in a healthy body, so go on a walk in the morning and in their power to exercise (Exercise) English | The healthier your body, the more you stay active and full of confidence |
14. Find answers to questions
If you have any questions or feel free to answer any question you do not understand then ask for help from his teacher | repeatedly question, or to over may be that the, your teacher if you scolding, Believe whether student actually is willing to learn all the teachers love him and always willing to help her live |
15. Use all resources
For studies of all available resources (Resources) Use all the | read the books, the library (Library) Go in, Get help from your teachers and parents, friends and ask for help from older siblings, Internet and television etc. make positive use of resources available for their studies |
16. blank cards (Blank Cards) Use
Key points of a particular thing or North Reading (Main Points) small sized for writing, you can use the blank cards or statements | these cards at the time of the revision will be helpful enough | While careful, meaning It should not be removed when you copy them to the test (Cheat Notes) as Use |
17. Encourage yourself
Encourage self examination before building (Motivate) In | remember the events of life, when you were successful | Remind yourself believe that you have been successful in the past in difficult conditions and examinations | the test Sure, you will be successful with good marks | Your confidence will grow this type of positive thoughts and you will perform better in exams |
18. Read the question carefully
Whenever you do a test before starting to write the answers, the questions carefully read at least twice | This sure Responses what would be the Questions What correct | times palpitation not understand we question give the wrong answer and write it |
19. Take water in overdose
Science has proven the fact that the higher the level of water in the body lasts, the more our brain works more efficiently | need to drink water in this high volume | the water at the time of a bottle of study minion Should | If possible, test center (Examination Centre) go to take a water bottle with you from time to time and Drink |
20. Go down
If the answer in exam difficulty in remembering that there is no need to panic | anxiety can worsen the situation more | Go sit quietly for a few moments, closing your eyes and take a deep breath | the in the makes your mind cool help | Then slowly try to remember the answer | whatever the main point (Main Point) come to mind, write it on paper |
A summary of the tips above and attractive Ebook you to our can Free Download from | It is available both in Hindi and English |
Full of the competition in today's era everyone wants to come in first place | Every person wants to be successful | definition of success differs for everyone - might be different and must be | Whenever we are small - small successes earned goes to our confidence grows, but when we have lost someone we become discouraged | We need to understand that life is a Ilsiljil Kind of graph | until Ilsiljil
उसी प्रकार यदि जीवन में उतार- चढ़ाव न हों तो जीवन रसहीन हो जाता है | इसलिए जीवन में असफलताओं का होना भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना की सफलताओं का | असफलताओं से लड़ते हुए जब आदमी सफ़लता प्राप्त करता है, तभी वह उसका पूर्ण आनंद ले is |
जीवन में सफ़लता प्राप्त करने की लिए यह अति आवश्यक है कि हम अपने मन को असफलता के डर से ग्रसित न होने दें | क्योंकि जिस व्यक्ति की मन में यह भय बैठ जाता है की वह जीवन में कुछ नहीं कर पाएगा, तो फिर उसके लिए सफल becomes hard to be | so it is very important that we abandon such mentality and just let today |
Warm Wishes for your bright future |