Monday, May 26, 2014

जब जीना दूभर सा कर देती है यह खारिश-खुजली....

हमारे यहां खुजली मिटाने वाली दवाईयों की बिक्री बहुत होती है क्योंकि अकसर लोग बिना किसी डाक्टरी सलाह के अपने आप ही कोई भी ट्यूब बाज़ार से ला कर लगानी शुरू कर देते हैं। बहुत बार तो देखने में आया है कि स्टीरॉयड युक्त ट्यूबें भी खुजली के लिए बिना किसी डाक्टर से परामर्श किए हुए खूब इस्तेमाल की जाती हैं। ऐसे में अकसर रोग को बढ़ावा मिल जाता है। हां,अगर को क्वालीफाईड चिकित्सक अथवा चमड़ी रोग विशेषज्ञ की देख रेख में—उस की सलाह अनुसार- आप इन ट्यूबों का इस्तेमाल कर रहे हैं तो बात और है।
किसी भी तरह के चर्म-रोग होने पर तुरंत अपने चिकित्सक से मिलें----कईं बार कुछ दिन दवाई लगाने पर उपेक्षित आराम नहीं मिलता । ऐसे में आप का फैमिली डाक्टर आप को स्वयं ही किसी चर्म-रोग विशेषज्ञ के पास रैफर कर देगा, अन्यथा आप स्वयं भी किसी प्रशिक्षित चर्म रोग विशेषज्ञ से मिल सकते हैं।
मेरे एक मित्र की माता जी की एक आंख के आस-पास चेहरे की चमड़ी में अचानक दर्द रहने लगा......दर्द बहुत तेज़ था.....साथ में छोटे छोटे दाने से निकल आये। उस ने किसी दूसरे शहर में रह रहे हमारे किसी मित्र से बात की जो चर्म-रोग विशेषज्ञ हैं....उस ने सारी बात सुनते ही उस मित्र को कहा कि अपने शहर के किसी चर्म-रोग विशेषज्ञ के पास माता जी को तुरंत ले कर जाओ क्योंकि देख कर ही पूरा पत लग पायेगा (शायद वो पूरी डिसक्रिपश्न सुन कर डॉयग्नोसिस कर चुके थे) । जब चर्म –रोग विशेषज्ञ के पास माता जी को लेकर जाया गया, तो उस ने देखते ही कह दिया की यह तो इन को हर्पिज़ यॉस्टर हुया है। खूब सारी दवाईंयां तुरंत शुरू की गईं...और नेत्र विशेषज्ञ से मिलने को भी कहा गया। नेत्र विशेषज्ञ ने भी यही कहा कि टाइम पर आ गए हो, नहीं तो आँख ही बेकार हो सकती थी। यह बात बताने का उद्देश्य केवल इतना ही है कि हम किसी भी चमड़ी की तकलीफ को इतना लाइटली न लें।
तो , आज कुछ बातें स्केबीज़ चर्म रोग के बारे में करते हैं जिस से लोग बहुत परेशान भी होते हैं और डर भी बहुत जाते हैं।
स्केबीज़ चर्म रोग सारकॉपटिस स्केबी नामक एक छोटे से कीड़े के द्वारा फैलता है। यह छूत की बीमारी तो है लेकिन यह हवा, पानी अथवा सांस के द्वारा नहीं फैलती, बल्कि यह रोगी के साथ निकट संपर्क से फैलती है। इसलिए परिवार में एक व्यक्ति से यह सारे परिवार में ही अकसर फैल जाती है। इस रोग से ग्रस्त व्यक्ति को छूने मात्र ही से यह रोग नहीं हो जाता बल्कि नज़दीकी एवं काफी लंबे अरसे तक रोग-ग्रस्त व्यक्ति के संपर्क में रहने से यह फैलता है।
इस के बारे में विशेष ध्यान देने योग्य बात यह भी है कि इस का संक्रमण होने पर लगभग एक महीने या उस से भी ज्यादा समय तक मरीज को बिल्कुल खुजली नहीं होती और इस दौरान तो उसे यह भी पता नहीं होता कि उसे कोई चर्म रोग है। लेकिन इस दौरान भी उस के द्वारा यह रोग आगे दूसरे लोगों को तो अवश्य फैल सकता है।
आम तौर पर बच्चों में यह रोग बहुत आम है। इस में सारे शरीर पर छोटे-छोटे दाने हो सकते हैं जिन में बेहद खुजली ( खास कर रात के समय) होती है, लेकिन आम तौर पर ये दाने उंगलियों के बीच, कलाई पर, पेट पर एवं प्रजनन अंगों पर ही होते हैं।
इन दानों पर खुजली करने से संक्रमण बढ़ता है, पस वाले फोड़े बन जाते हैं जिस की वजह से शरीर के विभिन्न भागों में गांठें ( लिम्फ नॉड्स) सूज जाती हैं और बुखार हो जाता है।
साधारणतयः स्कबीज़ चर्म रोग से मृत्यु हो जाना सुनने में नहीं आता, लेकिन अगर छोटे बच्चों को यह त्वचा रोग हो तो उन का विशेष ध्यान रखने की ज़रूरत है। इन में रोग –प्रतिरोधक क्षमता( इम्यूनिटि) तो वैसे ही कम होती है—अगर पस पड़ने से, बुखार होने से , संक्रमण रक्त में चला जाए ( सैप्टीसीमिया) तो यह जान लेवा सिद्ध हो सकता है।
इस स्केबीज़ चर्म रोग के इलाज के लिए कुछ ध्यान देने योग्य बातें ये भी हैं....
· घर में एक भी सदस्य को स्केबीज़ होने पर पूरे परिवार का एक साथ इलाज होना लाज़मी है।
· इस बीमारी के पूर्ण इलाज के लिए बहुत ही प्रभावशाली लगाने वाली दवाईयां उपलब्ध हैं। इन का प्रयोग आप अपने चिकित्सक से मिलने के पश्चात् कर सकते हैं। गले के नीचे-नीचे शरीर के सभी भागों में इसे ब्रुश से लगाया जाता है। सारे शरीर की चमड़ी पर इसे लगाना बहुत ज़रूरी है। अगर मरीज इस केवल उन जगहों पर ही लगाएंगे जहां पर ये दाने हैं तो बीमारी का नाश नहीं हो पाएगा। 24घंटे के अंतराल पर यह दवाई ऐसे ही शरीर पर दो बार लगाई जाती है। और उस के बाद नहा लिया जाता है। इस दवाई का शरीर पर 48 घंटे लगे रहना बहुत ज़रूरी है।
· विश्व विख्यात पुस्तक “ जहां कोई डाक्टर न हो”के लेखक डेविड वर्नर इस पुस्तक में स्केबीज़ पर एक पेस्ट लगाने की सलाह देते हैं। इसे तैयार करने की विधि इस प्रकार है—थोड़े से पानी में नीम के कुछ पत्ते उबाल लें। इस हल्दी के पावडर के साथ मिला कर एक गाढ़ी पेस्ट बना लें। सारे शरीर को अच्छी तरह से साबुन लगा कर धोने के पश्चात् इस पेस्ट का सारे शरीर विशेषकर उंगलियों के बीच के हिस्सों, टांगों के अंदरूनी हिस्सों( inside portion of thighs) एवं पैरों की उंगलियों के बीच लेप कर दें। उस के बाद सूर्य की रोशनी में कुछ समय खड़े हो जायें। अगले तीन दिनों तक रोज़ाना यह लेप करें, लेकिन नहाएं नहीं। चौथे दिन मरीज़ नहाने के बाद साफ़ सुथरे, सूखे कपड़े पहने। चमड़ी रोग विशेषज्ञ से मिलने से पहले आप इस घरेलु पेस्ट का उपयोग तो अवश्य कर ही सकते हैं , लेकिन प्रोपर डायग्नोसिस एवं यह पता करने के लिए कि रोग जड़ से खत्म हो गया है या नहीं...इस के लिए चर्म-रोग विशेषज्ञ से मिलना तो ज़रूरी है ही।
· स्केबीज़ से डरिए नहीं, इस का इलाज तो बहुत आसान है ही, रोकथाम भी बड़ी आसान है। साफ़-स्वच्छ जीवन-शैली, रोज़ाना नहा धो-कर कपड़े बदलने से इससे बचा जा सकता है। कपड़े और बिस्तर की सफाई का ध्यान रखें और सूर्य की रोशनी में इन्हें अच्छी तरह सुखाएं। और हां, छोटे बच्चों को भी यह रोग होने पर तुरंत चिकित्सक से मिलें।

मसूड़ों से खून निकलना.....कुछ महत्त्वपूर्ण बातें...

मसूड़ों से खून निकलना एक बहुत ही आम समस्या है, लेकिन अधिकांश लोग इसे गंभीरता से नहीं लेते। हां, अकसर लोग इतना ज़रूर कर लेते हैं कि अगर ब्रुश करने समय मसूड़ों से खून निकलता है तो ब्रुश का इस्तेमाल करना छोड़ देते हैं और अंगुली से दांत साफ करना शुरू कर देते हैं। यह बिल्कुल गलत है – ऐसा करने से पायरिया रोग बढ़ जाता है। कुछ लोग किसी मित्र-सहयोगी की सलाह को मानते हुये कोई भी खुरदरा मंजन दांतों पर घिसने लगते हैं , कुछ तो तंबाकू वाली पेस्ट को ही दांतों-मसूड़ों पर घिसना शुरू कर देते हैं। यह सब करने से हम मुंह के गंभीर रोगों को बढ़ावा देते हैं। 

जब भी किसी को मसूड़ों से रक्त आने की समस्या हो तो उसे प्रशिक्षित दंत-चिकित्सक से मिलना चाहिये। वहीं आप की समस्या के कारणों का पता चल सकता है। बहुत से लोग तो तरह तरह की अटकलों एवं भ्रांतियों की वजह से अपना समय बर्बाद कर देते हैं...इसलिये अगर किसी को भी यह मसूड़ों से खून निकलने की समस्या है तो उसे तुरंत ही अपने दंत-चिकित्सक से मिलना चाहिये। 

मसूड़ों से खून निकलने का सबसे आम कारण दांतों की सफाई ठीक तरह से ना होना है जिसकी वजह से दांत पर पत्थर( टारटर) जम जाता है। इस की वजह से मसूड़ों में सूजन आ जाती है और वें बिल्कुल लाल रंग अख्तियार कर लेते हैं। इन सूजे हुये मसूड़ों को ब्रुश करने से अथवा हाथ से छूने मात्र से ही खून आने लगता है। जितनी जल्दी इस अवस्था का उपचार करवाया जाये, मसूड़ों का पूर्ण स्वास्थ्य वापिस लौटने की उतनी ही ज़्यादा संभावना रहती है। इस का मतलब यह भी कदापि नहीं है कि अगर आप को यह समस्या कुछ सालों से परेशान कर रही है तो आप यही सोचने लगें कि अब इलाज करवाने से क्या लाभ, अब तो मसूड़ों का पूरा विनाश हो ही चुका होगा। लेकिन ठीक उस मशहूर कहावत....जब जागें, तभी सवेरा....के मुताबिक आप भी शीघ्र ही अपने दंत-चिकित्सक को से दिखवा के यह पता लगवा सकते हैं कि आप के मसूड़े किस अवस्था में हैं और इन को बद से बदतर होने से आखिर कैसे बचाया जा सकता है। 

कुछ लोग तो इस अवस्था के लिये अपने आप ही दवाईयों से युक्त कईं प्रकार की पेस्टें लगाना शुरू कर देते हैं अथवा महंगे-महंगे माउथ-वॉशों का इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं। लेकिन इस तरह के उपायों से आप को स्थायी लाभ तो कभी भी नहीं मिल सकता .....शायद कुछ समय के लिये ये सब आप के लक्षणों को मात्र छिपा दें। 


मसूड़ों की बीमारियों से बचने का सुपर-हिट अचूक फार्मूला तो बस यही है कि आप सुबह और रात दोनों समय पेस्ट एवं ब्रुश से दांतों की सफाई करें, जुबान साफ करने वाली पत्ती ( टंग-क्लीनर) से रोज़ाना जुबान साफ करें और हर खाने के बाद कुल्ला अवश्य कीजिये। इस के साथ साथ तंबाकू के सभी रूपों, गुटखों एवं पान-मसालों से कोसों दूर रहें। 

अकसर लोग अपनी छाती ठोक कर यह कहते भी दिख जाते हैं हम तो भई केवल दातुन से ही दांत कूचते हैं...यही राज़ है कि ज़िंदगी के अस्सी वसंत देखने के बाद भी बत्तीसी कायम है। यहां पर मैं भी उतनी ही बेबाकी से यह स्पष्ट कर देना चाहूंगा कि बात केवल मुंह में बत्तीसी कायम रखने तक ही तो सीमित नहीं है, बल्कि उस बत्तीसी का स्वस्थ रहना भी ज़रूरी है। 

अकसर मैंने अपनी क्लीनिकल प्रैक्टिस में नोटिस किया है कि जो लोग केवल दातुन का ही इस्तेमाल करते हैं, उन में से भी काफी प्रतिशत ऐसे भी होते हैं जिन के मसूड़ों में सूजन होती है। लेकिन इस का दोष हम दातुन पर कदापि नहीं थोप सकते !....यह क्या ?...आप किस गहरी सोच में पढ़ गये हैं !...सीधी सी बात है कि अगर आप कईं सालों से दातुन का ही इस्तेमाल कर रहे हैं और आप को दांतों से कोई परेशानी नहीं है तो भी आप अपने दंत-चिकित्सक से नियमित चैक-अप करवाइये। अगर वह आप के मुंह का चैक-अप करने के पश्चात् यह कहता है कि आप के दांत एवं मसूड़े बिल्कुल स्वस्थ हैं तो ठीक है ....आप केवल दातुन का ही प्रयोग जारी रखिये। लेकिन अगर उसे कुछ दंत-रोग दिखते हैं तो आप को दातुन के साथ-साथ ब्रुश-पेस्ट का इस्तेमाल करना ही होगा। 

एक विशेष बात यह भी है कि अकसर लोग दातुन का सही इस्तेमाल करते भी नहीं—वे दातुन को चबाने के पश्चात् दांतों एवं मसूड़ों पर कुछ इस तरह से रगड़ते हैं कि मानो बूट पालिश किये जा रहे हों...ऐसा करने से दांतों की संरचना को नुकसान पहुंचता है। आप चाहे दातुन ही करते हैं, लेकिन इस को भी दंत-चिकित्सक की सलाह अनुसार ब्रुश की तरह ही इस्तेमाल कीजिये।

मुंह के ये घाव/छाले......III.......कैसे होंगे ये ठीक ?

स्वाभाविक प्रश्न है कि जब मुंह में ये छाले हो ही जायें, तो इन का इलाज कैसे किया जाये। इन के इलाज के लिये जो बात समझनी सब से महत्त्वपूर्ण है वह यही है कि इन छालों को ठीक करना किसी डाक्टर के वश की बात तो है नहीं....क्योंकि अन्य बीमारियों की तरह प्रकृति ही इन से निजात दिलाने में हमारी मदद करती है। हम ने तो सिर्फ़ मुंह में एक ऐसा वातावरण मुहैया करवाना है जो कि इन छालों को शीघ्रअतिशीघ्र ठीक होने में (हीलिंग) मदद करे।

सब से महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जब हम लोग मुंह के इन छालों से परेशान हों तो हमें अपना खान-पान बिल्कुल बलैंड सा रखना होगा.....बलैंड से मतलब है बिल्कुल मिर्च-मसालों से रहित। मैं अपने मरीज़ों को ऐसे खान-पान के लिये प्रेरित यह कह कर करता हूं कि अगर हमारे चमड़ी पर कोई घाव है तो उस पर नमक लग जाये तो क्या होता है, ठीक उसी प्रकार ही मुंह में छाले होने पर भी अगर मिर्च-मसाले वाला खाना खाया जायेगा तो कैसे होगी फॉस्ट हीलिंग ?

और , दूसरी बात यह है कि मुंह के इन छालों पर कोई भी दर्द-निवारक ऐंसीसैप्टिक ड्राप्स लगा देने चाहियें......ऐसे ड्राप्स अथवा अब तो इन्हीं नाम से ट्यूब रूप में भी दवायें आने लगी हैं....कुछ के नाम मैं लिख रहा हूं.......Dentogel, Dologel, Zytee, Emergel, Gelora ORAL ANALGESIC / ANTISEPTIC GEL…….ये पांच नाम हैं जिन को कि मैं हज़ारों मरीज़ों के ऊपर इस्तेमाल कर चुका हूं। ( Please note that there is no commercial interest of mine involved in telling you all this…….you may find and use anyone which you feel is more suitable…. as long as it serves your purpose. Just telling you this because I an very much against all such endorsements !) …….नोट करें कि इन का भी काम मुंह के छाले को भरना नहीं है....ये केवल आप को उस छाले से दर्द से कुछ समय के लिये राहत दिला देती हैं। इन पांचों में से आप किसी भी एक दवाई को लेकर दिन में दो-चार बार छालों पर लगा सकते हैं। वैसे विशेष रूप से खाना खाने से पांच मिनट पहले तो इस दवाई का प्रयोग ज़रूर कर लें। और हां, दो-चार मिनट के बाद थूक दें। लेकिन बाई-चांस अगर कभी कभार गलती से एक-आध ड्राप निगल भी ली जाये तो इतना टेंशन लेने की कोई बात नहीं होती।

अब आते हैं इन मुंह के छालों के इलाज के लिये उपयोग होने वाली एंटीबायोटिक दवाईयों पर। वास्तव में ये मुंह के छाले वाला टापिक इतना विशाल है कि स्ट्रेट-फारवर्ड तरीके से सीधा कह देना कि एंटीबायोटिक दवाईयां लेनी हैं कि नहीं ....कुछ कठिन सा ही काम है। जैसे जैसे मैं इस सीरिज़ में आगे बढूंगा तो हम देख कर हैरान रह जायेंगे कि इन मुंह के छालों की भी इतनी श्रेणीयां हैं और इन का इलाज भी इतना अलग अलग किस्म का। अभी तो मैं केवल बात कर रहा हूं उन छालों को जो लोगों को यूं ही कभी कभी परेशान करते रहते हैं....इन में किसी एंटीबायोटिक दवाईयों का कोई स्थान नहीं है। लेकिन अगर इन छालों की वजह से थूक निगलने में दिक्कत होने लगे या जबाड़े के नीचे गोटियां सी आ जायें( Lymphadenitis……lymph nodes का बढ़ जाना और दर्द करना) ...तो एंटीबायोटिक दवाईयां 3-4दिनों के लिये लेनी पड़ सकती हैं।

और आप कोई दर्दनिवारक टीकिया भी अपनी आवश्यकतानुसार ले सकते हैं।

कईं प्रैस्क्रिप्श्नज़ देखता हूं जिन में मैट्रोनिडाज़ोल की गोलियों का कोर्स करने की सलाह दी गई होती है। मेरे विचार में इन गोलियों को इन मुंह के छालों के लिये नहीं लेना चाहिये।

मल्टी-विटामिन टैबलेट लोग अकसर गटकनी शुरू कर देते हैं.....ठीक हैं, अगर किसी को इस से सैटीस्फैक्शन मिलती है तो बहुत अच्छा है। लेकिन मेरा तो दृढ़ विश्वास यही है कि अगर विटामिन सी की जगह कोई मौसंबी, कीनू, संतरे का जूस पी लिया जाये, य़ा तो नींबू-पानी ही पी लिया जाये या आंवले का किसी भी रूप में सेवन कर लिया जाये तो वो शायद सैंकड़ो गुणा बेहतर होगा। एक बात और कहना चाहूंगा कि जब मेरे पास ऐसे मरीज़ आते हैं तो मैं तो इस मौके को उन की खान-पान की आदतें बदलने के लिये खूब इस्तेमाल करता हूं। जैसे कि किसी को अगर आप ने अंकुरित दालें खाने के लिये प्रेरित करना हो तो इस से बेहतर और क्या मौका हो सकता है। शायद जब वे ठीक ठाक हों तो आप की इस सलाह को हंस कर टाल दें....लेकिन जब वे मुंह के छालों से परेशान हैं तो वे कुछ भी करने को तैयार होते हैं। ऐसे में उन को इस तरह की प्राकृतिक खाद्य पदार्थों के इस्तेमाल के लिये प्रेरित करना और संतुलित आहार लेने की बातें वे खुशी खुशी पचा लेते हैं। एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण बात तो बतानी पिछली पोस्ट में भूल ही गया था कि ये जो अंकुरित दालें हैं ना ये विटामिनों से पूरी तरह से विशेषकर बी-कंप्लैक्स विटामिनों से भरपूर होते हैं। इसलिये इन्हें Power Dynamos भी कहा जाता है।

मुझे ख्याल आ रहा है कि मैंने पिछली पोस्ट में एक होस्टल में रह रहे 20-22 के लड़के की बात की थी......लेकिन बात वही है कि होस्टल में तो कुछ भी हो, हमें मैदे जैसे आटे की ही रोटियां मिलने वाली हैं। तो , ऐसे में उस लड़के को यह भी ज़रूर चाहिये कि वह खुद सलाद बना कर खाया करे,अपने रूम में ही अंकुरित दाल तैयार किया करे ( आज कल तो रिलांयस ग्रीन के स्टोर पर भी ये अंकुरित दालें मिलने लगी हैं) और हां, दो-तीन मौसमी रेशेदार फल ज़रूर ज़रूर खाया करें। इस से कब्ज की भी शिकायत न होगी और संतुलित आहार मिलने से मुंह की चमड़ी भी हृष्ट-पुष्ट हो जायेगी जिस से कि उस में छाले बनने की फ्रिकवैंसी धीरे धीरे कम हो जायेगी। सीधी सी बात है कि यहां भी काम हमारी इम्यूनिटी ही कर रही है....अगर अच्छी है तो हम इन छोटी मोटी परेशानियों से बचे रहते हैं।

अगली बात यह है कि मुंह में चाहे छाले हों, लेकिन धीरे धीरे हमें अपने दांतों को रोज़ाना दो बार ब्रुश तो अवश्य करना ही चाहिये। थोड़ा बच कर कर लें ताकि किसी छाले को न ज्यादा छेड़ दें। लेकिन इस के साथ ही साथ जुबान को रोज़ाना साफ करना निहायत ही ज़रूरी है....क्योंकि हमारी जुबान की कोटिंग पर अरबों-खरबों जीवाणु डेरा जमाये रहते हैं जिन से रोज़ाना निजात पानी बहुत आवश्यक है....नहीं तो ये दुर्गंध तो पैदा करते ही हैं और साथ ही साथ इन छालों को भी जल्दी ठीक नहीं होने देते। इन मुंह के छालों के होते हुये भी मैं जुबान की सफाई की सिफारिश इसलिये भी कर रहा हूं कि अकसर ये घाव/छाले जुबान की ऊपरी सतह पर नहीं होते हैं। लेकिन अगर कभी इस सतह पर भी छाले हैं तो आप दो-तीन दिन इस टंग-क्लीनर को इस्तेमाल न करियेगा।

अब बात आती है......बीटाडीन से कुल्ले करने की। अगर आप छालों की वजह से ज़्यादा ही परेशान हैं तो Betadine ….Mouth gargle से दिन में दो-बार कुल्ले कर लेने बहुत लाभदायक हैं........हमेशा के लिये नहीं............केवल उन एक दो –दिन दिनों के लिये ही जिन दिनों आप इन छालों से परेशान हैं। लेकिन रात के समय सोने से पहले इन छालों वालों दो-चार दिनों में इस बीटाडीन गार्गल से कुल्ला कर लेने बहुत लाभदायक है। यह भी आप की आवश्यकता के ऊपर निर्भर करता है...मेरे बहुत से मरीज़ फिटकरी वाले गुनगुने पानी से ही कुल्ले कर के खुश रहते हैं तो मैं भी उन की खुशी में खुश हो लेता हूं.....।

अब जाते जाते एक बहुत ही महत्वपूर्ण बात यह है कि बहुत से लोग कुछ कुछ देसी तरह की चीज़े जैसे हल्दी , मलाई, ग्लैसरीन इन छालों के ऊपर लगाते रहते हैं....उन्हें इन से आराम मिलता है ....बहुत बढिया बात है....आयुर्वेद में और भी तो बहुत सी चीज़ें हैं जो हम लोगों को इन छालों के ऊपर लगाने के लिये अपने रसोई-घर से ही मिल जाती हैं , इन का भरपूर इस्तेमाल किया जाना चाहिये। ये दादी के नुस्खे नहीं हैं.....दादी की लक्कड़दादी भी ज़रूर इन्हें ही इस्तेमाल करती थी। लेकिन बस एक चीज़ से हमेशा बचें........कभी भूल कर भी एसप्रिन की गोली पीस कर मुंह में न रख लें.........भयंकर परिणाम हो जायेंगे......छालों से राहत तो दूर, मुंह की सारी चमड़ी जल जायेगी।

So, take care !! पोस्ट लंबी है लेकिन निचोड़ यही है कि इन छालों की इतनी टेंशन न लिया करें। और जितने भी प्रश्न हों, खुल कर टिप्पणी में लिख दें या ई-मेल करें....एक-दो दिन में जवाब आप के पास अगली पोस्ट के रूप में पहुंच जायेगा। बस, अपने खान-पान का ध्यान रखा करें और तंबाकू-गुटखा-पानमसाला के पाऊच बाहर किसी गटर में आज ही फैंक दें।

Sunday, May 25, 2014

Benefits of Custard Apple



Custard Apple or Seethaphal is a tropical fruit tree that grows easily. The flesh is white and creamy with a sugary taste. The seeds are black in colour with a shine. The seeds are not consumed for they are slightly poisonous. Custard apple promotes digestion and is used as a cure for vomiting, diarrhea, dysentery and vertigo. The unripe fruit is dried and powdered and is used as a cure for treating lice. The fruit is high in calorie content but contains minerals like iron, phosphorous, calcium and riboflavin. Custard apple Nutrition Custard apples are packed with vitamin C, an antioxidant that can combat the free radicals in the body. The fruit also has vitamin A, which is good for healthy skin, better vision and for healthy hair. The magnesium in custard apples can protect the heart from cardiac diseases and can relax the muscles. Custard apples are an excellent source of copper. Copper is a trace mineral that helps are body form hemoglobin. When a woman doesn’t have enough copper in her system, there is an increased risk that her child will be born early. Other side effects of a copper deficiency include brittle bones and a low white blood cell count. The average person needs about nine hundred micrograms of copper each day. Pregnant women need one thousand micrograms of copper each day, and if she decides to breastfeed she will need approximately thirteen hundred micrograms of copper. Custard apples are also rich in vitamin B6 and potassium. Custard apples are also rich in copper and have plenty of dietary fiber, which is good for keeping the digestive tract healthy and aids digestion as well prevents constipation. Custard apples have low levels of fat, which is good for health. It is believed that a paste made with the creamy flesh of the fruit can be used as a balm to treat boils, abscesses and ulcers. Custard apples can be sun-dried and then ground into a powder, which can treat dysentery and diarrhea. Custard apples also act as coolants, stimulants and expectorants. These fruits are good for treating anemia. Some people make the fruit into a beverage that can act as a substitute to milk. Even the bark of the custard apple tree, which contains astringents and tannins, is used in making herbal medicines. The leaves of the tree are supposed to be god for treating cancer and tumors; while the bark can relieve toothaches and gum pain. Custard apples are a rich source of the Vitamin B6. It is important that you eat a diet that is rich in Vitamin B6 because a deficiency can cause skin problems, an extremely sore tongue, convulsions, depressions, and depression. The older a person gets the greater the chances of a Vitamin B6 deficiency.

 Custard apple calories 
100 gm of custard apple contains
Calories: 100 
Water: 75.0 g 
Fat: 0.6 g 
Sugar: 15 gm
 Dietary fiber: 3.5 g 
Carbohydrate: 23.71 gm
 Protein: 1 to 4.3 gm
 Iron: 0.7 mg 
Calcium: 20 mg 
Custard apples are a well-balanced food having protein, fibre, minerals, vitamins, energy and little fat. They are an excellent source of Vitamin C, a good source of dietary fibre, a useful source of Vitamin B6, magnesium and potassium, and with some B2 and complex carbohydrate. Health tips for Custard apple There are lots of custard apple benefits and custard apple is consumed in row form. Custard milk shake also tasted good. Custard Apple Benefits are immense. Custard apples do taste well, but they are also good for health. Custard apples are good to have them as part of one’s diet.

Wednesday, May 21, 2014

ब्रेड भी हो सकती है खतरनाक!

हमारे देश के कई घरों में सुबह का नाश्ता और 'ब्रेड' एक-दूसरे के पूरक हैं। कोई ब्रेड मक्खन के साथ खाता है, तो कोई चीज स्प्रेड के साथ। कोई ब्रेड को जेम के साथ खाता है तो कोई दूध में डालकर। ब्रेड को क्रीम के साथ भी खाया जाता है। ब्रेड के सेंडविच बनते हैं। बर्गर और पिज्जा के मूल में भी ब्रेड ही होती है। पावभाजी खाने वाले तो जानते ही हैं कि पाव मतलब ब्रेड ही है। हम रोजाना ब्रेड से रूबरू होते हैं और उसके कई प्रकार के पकवान बनाते-खाते हैं। 

ज्यादातर बेकरी आइटम्स में उसी आटे का उपयोग होता है जिससे ब्रेड बनती है। इसमें बिस्कुट तक शामिल है, लेकिन क्या आपको पता है कि ब्रेड हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी हो सकती है। इतनी हानिकारक कि इससे हमारे स्वास्थ्य को कई बार गंभीर खतरा उत्पन्न हो सकता है। यह खतरा होता है 'पोटेशियम ब्रोमेट' नामक एक पदार्थ से। पोटेशियम ब्रोमेट का कैमिकल फार्मूलाE924a है। इसका मतलब रसायन शास्त्र की भाषा में इस पदार्थ को इसी फार्मूले से पहचाना जाता है। अब आप सोच रहे होंगे कि इस पदार्थ का ब्रेड से क्या संबंध। बस यही समझने की बात है। 

ब्रेड

पोटेशियम ब्रोमेट को ब्रेड बनाने से पहले आटे में मिलाना भारत में एक आम प्रथा है। यह प्रथा संसार के और भी कई देशों में प्रचलित है। हालाँकि इस पदार्थ की नियंत्रित मात्रा ही आटे में मिलाई जाती है लेकिन यह मात्रा अगर जरा सी भी ज्यादा हो जाए तो यह ठीक से पचती नहीं है और हमारे लिए यह काफी हानिकारक सिद्ध हो सकती है। 

पोटेशियम ब्रोमेट को आटे की गुणवत्ता सुधारने के लिए उसमें मिलाया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इसे मिलाने से ब्रेड अच्छी तरफ फूलती है, ज्यादा सफेद दिखती है और जल्दी हजम होती है। लेकिन ऐसी सुंदर ब्रेड किस कदर खतरनाक हो सकती है यह हम सिर्फ इसी बात से समझ सकते हैं कि 1990 में समूचे योरप में पोटेशियम ब्रोमेट को किसी भी खाद्य पदार्थ में मिलाने से प्रतिबंधित कर दिया गया। 

अमेरिका में इसे वैसे तो 1991 में ही प्रतिबंधित कर दिया गया था लेकिन कैलीफोर्निया में इस आटे से बनी चीजों पर लेबल लगाना अनिवार्य होता है जिसमें साफ तौर पर बताना पड़ता है कि उस आटे में पोटिशियम ब्रोमेट मिला है। कनाडा में इस पदार्थ को 1994 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। 

रोल पिज्जा










बाद में वर्षों में यानी 2001 में इसे श्रीलंका व 2005 में चीन में भी प्रतिबंधित कर दिया गया। यह पदार्थ नाइजीरिया, ब्राजील और पेरु जैसे देशों में भी प्रतिबंधित है, लेकिन भारत में इसका अभी तक धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है और यह धीमा जहर रोजाना ब्रेड खाने वाले कई भारतीयों के शरीर में प्रवेश कर रहा है। 

एक अध्ययन के अनुसार मुंबई की पावभाजी में पोटेशियम ब्रोमेट की अत्यधिक मात्रा पाई जाती है। अब तमाम प्रयासों के बाद यूनिलीवर कंपनी (हिन्दुस्तान यूनीलीवर लिमिटेड) ने भारत में अपने सभी ब्रेड उत्पादों से पोटेशियम ब्रोमेट हटाने की घोषणा की है। यह एक अच्छी पहल है। 

कंपनी की देशभर में चलने वाली छः मार्डन बेकरी फैक्टरीज आगामी दिसंबर से अपने बैकरी उत्पादों में पोटेशियम ब्रोमेट का इस्तेमाल करना बंद कर देंगी। इसको प्रतिबंधित करवाने की मुहिम में कई स्वास्थ्य विशेषज्ञ लगे हैं फिलहाल भारत सरकार ने इस ओर ध्यान नहीं दिया है। 

हमें इस पदार्थ को लेकर न सिर्फ खुद जागरूक होना पड़ेगा बल्कि जनता तथा अपने देश की सरकार का भी इस ओर ध्यान दिलाना होगा ताकि अन्य बेकरी उत्पाद बनाने वाली कंपनियाँ भी इस पदार्थ का इस्तेमाल करना बंद करें। इसे प्रतिबंधित किया जाए। आखिर ये हमारे देश की जनता की सेहत का सवाल है।

देशी दही के खिलाफ

दही
हमारे देश में घर से कोई कहीं जाने लगता है तो शगुन के लिए दही खिलाने का रिवाज है। मतलब दही हमारे लिए एक आस्था भी है। दही में पलने वाला भला बैक्टीरिया हमारे पेट को सिर्फ कई रोगों से ही नहीं बचाता है बल्कि मान्यता है कि यह बुरी ताकतों से भी बचाता है। दही से बने मट्ठे के बारे में एक बहुत चर्चित कहावत है- जो खाए मट्ठा, वही होए पट्ठा। लेकिन लगता है, अब उस दही पर ही संकट आने वाला है। सरसों के तेल की तरह दही और उससे बने मट्ठे को बदनाम करने की कोई रणनीति बन रही हो तो उसमें आश्चर्य की बात नहीं। 

प्रोबायॉटिक्स फूड नए जमाने का क्रेज होने वाला है। ये ऐसे खाद्य पदार्थ हैं जिनमें फायदा पहुँचाने वाले बैक्टीरिया मौजूद होते हैं। इन भोजन की गुणवत्ता इस बात से आँकी जाएगी कि उनमें फायदा पहुँचाने वाले बैक्टीरिया की संख्या कितनी है । खाद्य पदार्थों में अरबों-खरबों में बैक्टीरिया होने के दावे किए जाएँगे। खमीर उठे हुए खाद्य पदार्थों में शरीर को फायदा पहुँचाने वाले ये बैक्टीरिया उत्पन्न होते हैं। पेट और आँत में ये बैक्टीरिया जब तक मौजूद रहते हैं किसी दुष्ट बैक्टीरिया के वहाँ फटकने का सवाल ही नहीं। इसमें डायरिया रोकने, प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने सहित अनेक गुण होते हैं। बाजार में इस तरह के दावे करने वाले प्रोबायॉटिक फूड व ड्रिंक्स की भरमार हो रही है । 


लेकिन भारत के खाद्य बाजार पर काबिज होने की योजना बना रही प्रोबायॉटिक्स फूड व ड्रिंक बनाने वाली मल्टीनेशनल कंपनियों को घर-घर में बनने वाली दही की लोकप्रियता खटक रही है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में शोध की देश की सबसे बड़ी संस्था इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) द्वारा प्रोबायॉटिक फूड को नियंत्रित करने के लिए पिछले महीने राजधानी में आयोजित खाद्य वैज्ञानिकों के सम्मेलन में देशी दही के खिलाफ चल रही साजिश की बू साफ आ रही थी। 

आईसीएमआर ने कहा है कि अगले साल तक प्रोबायॉटिक फूड को लेकर दिशा-निर्देश जारी कर दिए जाएँगे। सम्मेलन का सारांश बताने के लिए आयोजित प्रेस सम्मेलन में मौजूद कुछ वैज्ञानिक, जिसमें आईसीएमआर के पूर्व महानिदेशक भी थे, बार-बार यह साबित करने पर तुले हुए थे कि देशी दही में उतने गुण नहीं हैं जितने दूसरे प्रोबायॉटिक्स दही व फूड में हैं। 

वह अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में कुछ डॉक्टरों द्वारा घर में बनने वाली दही को लेकर किए गए शोध का उल्लेख कर रहे थे। शोध का निष्कर्ष है कि बच्चो में डायरिया को रोकने में देशी दही उतनी प्रभावी नहीं हुई है। यहाँ ध्यान देने की बात यह है कि उस संवाददाता सम्मेलन को प्रायोजित किया था जापानी जैसे नाम वाले एक प्रोबायॉटिक फरमेंटेड मिल्क ड्रिंक की कंपनी ने। 

दही










हैदराबाद स्थित सरकारी नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ न्यूट्रिशन के पूर्व महानिदेशक बी. शिव कुमार का कहना है कि देशी दही व मट्ठा पीने के बड़े फायदे हैं। घर में बनने वाली दही एक बेहतरीन प्रोबायॉटिक्स खाद्य पदार्थ है। उसे दोयम दर्जे का करार नहीं दिया जा सकता है। सही बात यह है कि देशी दही से तुलना कर ही अन्य प्रोबायॉटिक फूड बनाए जा रहे हैं। 


वे देशी दही के गुण में ही इजाफा करने के दावे कर रहे हैं। अब देखना है कि वे ऐसा कर पाते हैं या नहीं लेकिन इसका यह मतलब कतई नहीं हैं कि दही बेकार है। सबसे बड़ा सवाल है कि दही को जो स्वीकृति मिली हुई है, वह दूसरे प्रोबायॉटिक फूड को जल्दी नहीं मिलने वाली है। जिन बच्चों को दूध नहीं पचता, उन्हें भी घर में बनी दही दी जाए तो उन्हें फायदा होता है। 

आयुर्वेद के अनुसार भी दही की बड़ी तासीर है। जान-माने आयुर्वेद विशेषज्ञ डॉ. देवेंद्र त्रिगुणा का कहना है कि देशी दही का कोई जबाव नहीं है। इसके सेवन से कोलेस्ट्रॉल घटता है। खुलकर पेशाब आता है। देशी दही दिल व लीवर के लिए भी फायदेमंद है लेकिन हम मट्ठा पीने की सलाह अधिक देते हैं क्योंकि दही का तत्व (रसायन) वही है। 

भारत में दही एक परंपरा है। पंजाबियों का खाना ही लस्सी से शुरू होता है। वहाँ के गाँवों में लस्सी से ही मेहमानों का स्वागत होता है। जनवरी में बिहार में तो एक दही पर्व ही होता है इसलिए मल्टीनेशनल कंपनियों के लिए दही को बेदखल करना उतना आसान तो नहीं होगा लेकिन इसकी कोशिश शुरू हो गई है। घर में बनी दही के सामने डिब्बाबंद दही की कोई औकात नहीं है। 

आने वाले समय में बाजार में प्रोबायॉटिक आइसक्रीम, डिब्बाबंद दही, चिप्स एवं खाने की तमाम चीजों की भरमार होगी बिल्कुल जंक फूड की तरह। प्रोबायॉटिक फूड को लेकर आईसीएमआर अगले साल गाइडलाइंस जारी कर देगी। इस दिशा निर्देश के लागू हो जाने के बाद कंपनियों के लिए फायदे के दावे करना उतना आसान नहीं होगा लेकिन घर में माँ द्वारा जमाई गई दही जाँची परखी है इसलिए प्रोबायॉटिक फूड की भीड़ में दही को भूलने का नहीं।
संबंधित जानकारी खोजें

अंडरआर्म के पसीने से कैसे पाएं छुटकारा

पसीने की बदबू आपको शर्मिंदा कर सकती है। अगर आपके अंडर आर्म में ज्यादा पसीना  होता है तो इसका उपचार जरूर करें नहीं तो लोग आपसे दूर भागने लगेंगे। कई बार जब यह कपड़े पर दाग छोड़ देता है तो भी यह बहुत शर्मिंदगी भरा होता है। लेकिन अगर आप कुछ आसान उपचार अपनाएं तो आप बहुत हद तक अंडरऑर्म के पसीने को कंट्रोल कर सकते हैं। आइए जानें अंडर आर्म से बचने के उपायों के बारे में।

बेकिंग सोडा

नहाने के बाद थोड़ा सा बेकिंग सोडा लेकर पानी के साथ मिला कर अपने अंडरआर्म और शरीर पर लगा लें। इसके बाद उसे साफ तौलिये से पोंछ लें। बेकिंग सोडा को आप डियो लगाने के बाद भी प्रयोग कर सकते हैं। डियो स्‍प्रे करें और फिर उसके ऊपर से थोड़ा बेकिंग सोडा लगा लें।

साफ-सफाई का खयाल

अपने अंडरआर्म को साफ-सुथरा रखें। इससे पसीने को रोकने में बहुत मदद मिलती है। इससे पर्सनल हाइजीन होती है और आपकी त्‍वचा भी संक्रमण और बीमारी से बचती है। जब भी कपड़ा पहने तो उससे पहले अपने अंडरआर्म को सुखा लें। इससे कम पसीना आएगा।

खीरे का प्रयोग

नहाने के बाद अपने आर्मपिट पर खीरे की स्‍लाइस रगड़े। खीरे में एंटीऑक्‍सीड़ेंट पाया जाता है जो कि शरीर से बैक्‍‍टीरिया का नाश करके बदबू को आने से रोकता है।

आहार पर ध्यान दें

गर्मियां शरीर को बुरी तरह प्रभावित करती हैं। इस मौसम में पाचन तंत्र भी प्रभावित होता है। गर्मियों में ताजा और हल्का भोजन करें। खीरा, पुदीना, संतरा, तरबूज, मौसमी का सेवन करें, ये प्यास बुझाने वाले होते हैं, क्योंकि इसमें सोडियम और कैलोरी की मात्रा काफी कम और एंटी ऑक्सीडेंट, कैल्शियम तथा विटामिन ए काफी मात्रा में होते हैं। ये सब मिलकर इन्हें अच्छे ठंडक देने वाले भोज्य पदार्थ बना देते हैं। इसके अलावा दही और छाछ भी शरीर को ठंडक प्रदान करते हैं।

सेब का सिरका

सेब का सिरका नहाने से पहले सेब के सिरके को अपने बगल में 30 मिनट के लिये रोजाना लगाएं। फिर हल्के साबुन से धो लें। अच्छा रिजल्ट पाने के लिये इसे रात को सोने से पहले लगा लें।

get rid of sweating














नींबू

नींबू के प्रयोग  से पसीने को दूर रखने में मदद मिलती है। हांलाकि इस तरीके से आप अपने काले पड़ चुके आर्मपिट का रंग भी निखार सकते हैं।

कॉटन का प्रयोग

हमेशा लाइट कॉटन पहने आप जो कपड़ा पहनते हैं, कभी कभी वह भी आपको पसीना दे सकता है। इसलिये हमेशा कोशिश करें कि लाइट फैबरिक जैसे कॉटन आदि ही पहने। यह नमी को तुरंत ही सोख लेता है।

पानी ज्यादा पीएं

गर्मियों में पानी ज्यादा पीएं इससे पसीने की बदबू कम आएगी और आप खुद को तरोताजा महसूस करेंगे।

धूम्रपान बिगाड़ सकता है आपका रूप n

धूम्रपान का सुन्‍दरता पर असर
धूम्रपान के आदी लोगों को दिल, फेफड़े, मस्तिष्क और सेक्स जीवन पर धूम्रपान के बुरे प्रभावों की काफी हद तक जानकारी है। लेकिन, इस घातक आदत के प्रभाव आपकी सोच से भी ज्‍यादा भीषण है। यह आपके आंतरिक अंगों को नुकसान पहुंचाने के अलावा आपके रूप को भी बिगाड़ सकता है। यह आपको पीला और बीमार और समग्र व्यक्तित्व को बिगाड़ सकता है।


आंखों के आस-पास काले घेरे और सूजन
धूम्रपान करने वालों को रात को ठीक से नींद नहीं आती है। निकोटीन के कारण रात को बेचैनी रहने के कारण नींद की कमी पाई जाती है। नतीजतन आंखों के आस-पास काले घेरे और सूजन की समस्‍या होती है।


सोरायसिस
सोरायसिस त्‍वचा की वह स्थिति है जो धूम्रपान न करने वालों को भी हो सकती है। लेकिन सिगरेट की लत इस बीमारी के जोखिम को काफी हद तक बढ़ा देती है।


पीले दांत
सुन्‍दरता को बरकरार रखने में हमारे दांतों का बहुत बड़ा योगदान होता है। लेकिन सिगरेट में मौजूद निकोटीन आपके दांतों को पीला कर देता है। सिगेरट से दांतों पर दाग आ जाते हैं और धीरे-धीरे दांत अपनी चमक और असली रंग को खो देते हैं।

झुर्रियां
औसतन, धूम्रपान करने वाले न करने वालों की तुलना में लगभग 1.4 साल तक अधिक बड़े दिखाते हैं। धूम्रपान त्‍वचा को स्‍वस्‍थ रखने वाले ऊतकों को रक्त की आपूर्ति करने में बाधा उत्‍पन्‍न करता है। जिसके परिणामस्‍वरूप आपके चेहरे पर झुर्रियां आने लगती है और आप उम्र से पहले बढ़े लगने लगते हैं।


उंगलियों पर पीलापन
निकोटीन सिर्फ आपके दांतों को ही पीला नहीं करता बल्कि इससे आपकी उंगलियों और नाखूनों में भी पीलापन आने लगता है। इस तरह से आपकी सुंदरता कम होने लगती है।


पतले बाल
आपकी त्‍वचा, दांत और आंखों के अलावा सिगरेट आपके बालों को भी नुकसान पहुंचा सकता है। सिगरेट में मौजूद केमिकल बालों के रोम में मौजूद डीएनए को हानि पहुंचाता है। और निरंतर धूम्रपान करने से सेल हानिकारण मुक्त कण उत्‍पन्‍न करने लगते हैं जिससे बालों के गिरने की समस्‍या होती है।


निशान
निकोटीन शरीर के विभिन्न भागों में ऑक्सीजन युक्त रक्त के प्रवाह को प्रतिबंधित कर देता है जिससे रक्त वाहिकाएं संकरी हो जाती है। इसके कारण घावों को ठीक होने में बहुत अधिक समय लगता है और निशान लाल रंग के प्रतित होने लगते हैं।

दांतों का टूटना
धूम्रपान कई प्रकार की दंत समस्‍याओं जैसे ओरल कैंसर और अन्‍य कई प्रकार के मसूड़ों के रोगों का कारण बनता है जिससे दांतों को नुकसान हो सकता है। 


बेजान त्‍वचा
झुर्रियां और सूजी हुई आंखों के अलावा धूम्रपान से आपकी त्‍वचा सूखी, पीली और बेजान कर सकता है। त्‍वचा का इस तरह से रंग बदलना सिगरेट के धुएं के कारण होता है। सिगरेट के धुएं में उपस्थित कार्बन मोनोऑक्साइड आपकी त्वचा में ऑक्सीजन की जगह ले लेती है, और निकोटीन रक्त प्रवाह में बाधा उत्पन्न करती है।


स्‍ट्रेच मार्क्‍स
सिगरेट में मौजूद निकोटीन त्‍वचा में फाइबर और संयोजी ऊतको को नुकसान पहुंचाता है जिससे त्‍वचा में लोच और शक्ति में कमी आती है। वैसे तो तेजी से वजन बढ़ने या घटने के कारण शरीर पर स्‍ट्रेच मार्क्‍स के निशान आ जाते हैं। जो सामान्‍य तौर पर हल्‍की लकीरों जैसे होते हैं। लेकिन निकोटीन के कारण उत्‍पन्‍न मार्क्‍स के निशान कभी नहीं जाते हैं।



Tuesday, May 20, 2014

ब्यूटी के सरल घरेलू नुस्खे

शहद : यह त्वचा की झुर्रियां मिटाने में बड़ा सहायक है। यह खुश्क त्वचा को मुलायम कर रेशमी व चमकदार बनाता है।

विधि : चेहरे पर शहद की एक पतली तह चढ़ा लें। इसे 15-20 मिनट लगा रहने दें, फिर कॉटनवूल भिगोकर इसे पोंछ लें। तैलीय त्वचा वाले शहद में चार-पांच बूंद नीबू का रस डालकर उपयोग करें।

नीम : यह त्वचा में रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाता है। इसके प्रयोग से मुंहासे में जादू जैसा लाभ होता है।

विधि : चार-पांच नीम की पत्तियों को पीसकर मुलतानी मिट्टी में मिलाकर लगाएं, सूखने पर गरम पानी से धो लें।

केला : यह त्वचा में कसाव लाता है तथा झुर्रियों को मिटाता है।

विधि : पका केला मैश कर चेहरे पर लगाएं। आधा घंटे बाद ठंडे पानी से धो लें।

खान पान का स्वास्थ्य पर प्रभाव

खान पान का स्वास्थ्य पर प्रभाव
आपके खान-पान का आपके स्वास्थ्य पर बहुत गहरा प्रभाव पड़ता है। भले ही आपने अब तक इस ओर ध्यान न दिया हो लेकिन आपको यह जानकर ताज्जुब होगा कि हर भोजन और हर फल आपके स्वास्थ्य के लिए अलग-अलग उपयोगिता रखता है। मसलन आप बहुत थकी हैं या तनाव में हैं तो उसके लिए विशेष फल और विशेष खाना आपके लिए अच्छा होगा। कब और क्या खाएं बता रही हैं डायटीशियन शिखा शर्मा।


अगर आप तनाव महसूस कर रही हैं 


एक गिलास लस्सी या एक कटोरी दलिया: एक गिलास लस्सी या कोल्ड कॉफी पीने या एक कटोरी दलिया खाने से दिमाग को शांति मिलती हैं क्योंकि इसमें सेरोटोनिन पाया जाता है जो दिमाग को ताजगी देता है और तनाव को दूर करता है। 

अगर आप थकी हुई हैं 


मिक्स फ्रूट चाट: एक बाउल मिक्स फ्रूट चाट खाएं या एक गिलास मौसमी का जूस पिएं। इससे तत्काल एनर्जी मिलती है। इसमें फ्रूट शुगर होता है जिससे शीघ्र एनर्जी मिलती है। अगर फ्रूट चाट दही में मिलाकर लें तो लंबे समय तक के लिए एनर्जी मिलती है। 

एक्सरसाइज के बाद क्या खाएं 


चीज सैंडविच: आधे या एक घंटे बाद ऐसी चीज खाएं जिसमें प्रोटीन-कार्बोहाइड्रेट मिला हुआ हो। जैसे दलिया, चिकेन रोल, ब्राउन ब्रेड से बने चीज सैंडविच या पनीर सैंडविच। एक्सरसाइज के बाद कार्बोहाइड्रेट का स्तर कम हो जाता है और ऐसी चीज खाने से शरीर को कार्बोहाइड्रेट पुन: मिल जाता है।  

जुकाम से बचने के लिए 


संतरा या कीवी : आपके शरीर को सर्दी से मुकाबला करने के लिए विटामिन सी की जरूरत होती है। विटामिन सी कमी के कारण ही जुकाम होता है। जुकाम के दौरान शरीर की इम्यूनिटी कम हो जाती है जिसका मतलब है कि लिम्फोसाइट्स कम हो जाते हैं। विटामिन सी इसकी कमी को रोक सकता है। ऐसे में संतरा, पपीता, कीवी, केला या आंवला खाया जा सकता है। आंवले का पाउडर पानी के साथ पी सकती हैं। कीवी में एक संतरे की तरह विटामिन सी होता है। केले में विटामिन के साथ पोटैशियम भी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है, जो आपकी एनर्जी को बढ़ाता है और जुकाम से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है। 

अगर आप थककर पस्त हो गई हों 


मिल्क शेक: ऐसे में आपको तरल पदार्थ लेना चाहिए ताकि शरीर को पचाने में मेहनत न करनी पड़े। ठंडाई, मिल्क शेक, मैंगो शेक, एपल शेक या कोई भी फ्रूट शेक पीने से तत्काल एनर्जी मिलती है और ताजगी आ जाती है। मिल्क शेक से ट्रैंक्यूलिटी मिलती है जिससे आपको काफी आराम मिलता है। 

अगर आपको सिरदर्द हो  


पुदीने या तुलसी की चाय : यह चाय शहद के साथ पीने से लाभ होता है। हर्बल टी, तुलसी या पुदीने की चाय दिमाग को ठंडक प्रदान करती है। कोई भी तरल पदार्थ आपको रीहाइड्रेट करेगा। यदि आप चाय में शहद मिलाकर पीती हैं तो वह आपके ब्लड शुगर स्तर को अत्यधिक गिरने नहीं देगा। चाय जायकेदार होने के साथ-साथ आपको ताजगी भी प्रदान करेगी।