Friday, May 16, 2014

Health Benefits Of Melon




Melon fruit contains a lot of water (about 95% of the fruit) also rich in vitamins and minerals, so it has many benefits for our health. From the side of water content, melons can give sense of cool and soothing effect, so it can relieve heartburn and cleanse the kidneys from the remnants of metabolism.


Benefits of melon fruit itself has been tested to treat various types of diseases ranging from mild to chronic diseases. Melons are low in calories, with just 64 calories in a 1-cup serving of honeydew balls and fewer calories in cantaloupe, casaba or watermelon balls. At the same time, melons are high in essential vitamins and minerals. They contain almost no fat or saturated fat, making them an excellent choice for snacks or a side dish.

Melon Nutritional Values is 15.00 mg calcium; 25.00 mg phosphorus, 0.5 mg iron, 34 mg of Vitamin C; 640 mg IU Vitamin A, and 0.03 mg of Vitamin B1. Melon contains an anticoagulant called adenosine so it can stop the clotting of blood cells that can lead to stroke or heart diseases.

Melons are part of the gourd family that includes cucumbers and squashes with the difference that melons are consumed as fruits due to their much sweeter and juicy flavor. There are different types of Melons like:
  • Watermelon (tarbooz)
  • Cantaloupe (kharbooja)
  • Honeydew Melon etc

Melon Health Benefits

1. Cancer Prevention
Melon fruit contains high carotenoid that this fruit can prevent cancer and reduce the risk of lung cancer. Melon fruit can prevent and kill cancer seeds that will invade our bodies. So try to eat melons, to avoid cancer.

2. Stroke and heart disease Prevention
Melon contains an anticoagulant called adenosine to stop clotting of blood cells which can lead to stroke or heart diseases. So the melons will help smooth the blood in the body so that a small risk of stroke or heart diseases incidence.

3. Good for digestion
Melons can launch a bowel movement, when we are experiencing digestive problems then eat melon to be easy and smooth bowel movement. Water content in the melon is very good for digestion. Mineral content is able to eliminate the acidity of the body need to be eliminated because it can interfere with digestion, particularly in the stomach organ.

4. Maintaining healthy skin
Melon contains collagen, the protein compounds that affect the integrity of the cell structure in all connective tissues such as skin. Collagen also serve For accelerates wound healing and maintain skin firmness. If you often eat melon means the skin will not be rough and dry.

5. Helps heal kidney disease and eczema.
Melon has a very good diuretic power so that it can help cure kidney disease and severe diseases and acute eczema. If combined with lemon, then a melon can cure gout. So a good idea to consume melons regularly once a day in the morning.

6. Boost of Energy
Most melons are contain B vitamins. B vitamins are responsible for a lot of your body's energy production (they are necessary for the body to process sugars and carbs). Hence, eating melons can give you substantial energy

7. For weight loss
Melons are ideal food for people who want to lose weight because they are low in sodium, fat-free, cholesterol free and low in calories (a whole cup of watermelon contains only 48 calories). They will also make you feel fuller because of the high water content. The natural sweetness found in melons will help you not to be tempted to grab those high calorie sweets.
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कैंसर : कारण एवं निवारण

कैंसर एक ऐसी बिमारी है जिसे सुनकर ही मृत्यु का भय सताने लगता है । इस बीमारी के बारे में जागरूकता फैलाई जाती है कि कैसे इससे बचा जा सके तथा क्या उपचार किया जाये । अनुमानत: अमेरिका में प्रतिवर्ष लगभग दो लाख व्यक्तियों की मृत्यु कैंसर से होती है । तम्बाकू के अधिक सेवन, मोटापा, शारीरिक श्रम का अभाव तथा अल्पाहार से भी कैंसर होता है । भारत में २०१० में लगभग पाँच लाख लोगों की मृत्यु कैंसर से हो चुकी है । विश्व में कैंसर से मरने वालों में भारत द्वितीय स्थान पर है । पुरूषों में मुँह (२३%), अमाशय (१३%), फेफड़ों (११%) तथा स्त्रियों में गदर्न (१७%), आमाशय (१४%) एवं स्तन (१०%) कैंसर मुख्य रूप से होता है ।


     कैंसर में कोशिकाआें का विभाजन अनियंत्रित गति से होता है जिसे मेडिकल भाषा में नई वृद्धि (न्यूओप्लास्म) कहा जाता है । जब साधारण वृद्धि किसी एक स्थान पर सीमित होती है तो उसे अर्बुद कहते हैं जो कि कैंसर कारक नहीं होता । लेकिन जब यह अर्बुद निकटवर्ती कोशिकाआें को प्रभावित करता है तब इसे कैंसर युक्त कहा जाता है । कैंसर का एक स्थान से दूसरे स्थान पर फैलना अपरूपान्तरण (मेटासिस) कहलाता है ।
    कैंसर के योगदान मेंदो जीन मुख्य होते हैं जिन्हें आन्कोजीन, तथा सप्रेसर जीन कहा जाता है । आन्कोजीन सामान्य कोशिका विभाजन करते है लेकिन जब अधिकता हो जाती है तो अर्बुद बनता है । इसके विपरीत सप्रेसर जीन कोशिका विभाजन रोकती है या उसकी मृत्यु हो जाती है । इसे एपोटोसिस कहते हैं, यदि यह जीन लुप्त् है या काम नहीं कर रहा है तो आन्कोजीन का प्रभाव कम नहीं होता है तथा कोशिका कैंसर युक्त हो जाती है ।
    कैंसर वंशानुगत नहीं होता लेकिन जीन का उत्परिवर्तन व्यतिक्रम पैदा हो जाता है । कैंसर कारक पदार्थ जैसे - उपपरिवर्तक एन-नाइट्रोसो अवशेष जो कि लाल मांस में होते है कैंसर कारक होते हैं । एक्रिल एमाइड जो कि सब्जियों विशेषत: आलू को उच्च् ताप पर भूनने से पैदा होता है कैंसर कारक होता है । एस्पर्जिलस फ्लैक्स नामक फफूँदी जो कि भंडारित अनाज, मूंगफली, मक्खन पर होता है, से एल्फोटोक्सिन पैदा होता है । अप्राकृतिक मिठास पैदा करने वाले पदार्थ जैसे एसपर्टेम मसालेदार तथा धूर्मित भोजन मनुष्यों में कैंसर पैदा करता है । अर्बुद विषाणु जैसे हिपैटायटिस बी, यकृत कैंसर, मानव पैपिलोना विषाणु, जननांग कैंसर, मानव टी-कोशिका ल्युकोमिया-सिम्फोमा विषाणु, ल्यूकोमिया तथा एपस्टिन-बार विषाणु नाक तथा गले का कैंसर पैदा करते हैं ।
    कैंसर होनें के अनेकों कारण हो सकते हैं आजकल का खान पान रहन-सहन वातावरण का प्रदूषण, औषधियों एवं कीटनाशकों का उपयोग, पराबैंगनी किरणें आदि सभी कैंसर कारक हैं । लेकिन मुख्यत: रेडियो धर्मिता वाले पदार्थ, रैडान गैस, एक्स-किरणों का विकिरण, रासायनिक पदार्थो के सम्पर्क में रहना या उनका उपयोग करना, एराजीन तथा इण्डोसल्फान कीटनाशक, एसबेस्टस, लेड, मरकरी, कैडमियम, बेन्जीन, निकेल, आर्सेनिक, नाइट्रोसामीन तथा पॉलीक्लोरीनेटेड डाइफेनिल यौगिक, तम्बाकू, धूम्रपान तथा एल्कोहल का सेवन हैं ।
    कैंसर ऐसी बीमारी है जिसके लक्षण प्रारंभ में प्रकट नहीं होते अपितु इसके अधिक बढ़ जाने पर ही ज्ञात होता है । लेकिन कुछ केंसर जैसे अर्बुद जो कि शरीर की सतह के पास हो या ऐसी सृजन जो  कि स्तन अथवा अण्डकोष मेंहो आसानी से पता चल जाते है । त्वचा कैंसर एक मस्से, किसी विशेष निशान अथवा घाव जो कि ठीक न हो रहा हो द्वारा जाना जा सकता है ।
    मुख कैंसर में मुख के अंदर या जिव्हा पर सफेद दाग देखे जा सकते हैं। यदि अर्बुद कोशिका के अंदर है तो उसका पता तब तक नहींलगता जब तक कि अर्बुद बढ़कर शरीर के अन्य अंगों या रक्तवाहिनियों पर दबाव नहीं बनाता । आंत के कैंसर में कोष्ठबद्धता, दस्त होना तथा मल के आकार में परिवर्तन होता है । ब्लैडर या प्रास्टेट कैंसर में ब्लैडर की क्रियाबदल जाती है जैसे बार-बार या रूक-रूक कर पेशाब आना । यदि कैंसर मस्तिष्क में फैल गया है तो चक्कर आना, सरदर्द होना या अनिश्चितता पैदा होती है । फेफड़ें के कैंसर में खांसी आती है तथा सांस छोटी हो जाती है । अग्नाशय कैंसर में तब तक कोई लक्षण नहीं प्रकट होते जब तक निकटवर्ती नाड़ियों पर बने दबाव से दर्द नहीं होता या यकृत के कार्य को बाधित करके पीलिया रोग नहींपैदा हो जाता । इसी प्रकार आंत का अर्बुद कोष्ठबद्धता तथा उल्टी के लक्षण प्रकट करता है । अर्बुद के कारण पेट तथा सीने में दर्द होता   है । ल्यूकोमिया या रक्त कैंसर में रक्ताल्पता, थकावट तथा जोड़ों का दर्द होता है । अन्य लक्षणों में शरीर में दुर्बलता आना ज्वर का रहना, ग्रंथियों की सूजन, पसीना तथा थकावट रहना होता है ।
    जो चिकित्सक कैंसर का निदान एवं उपचार करते हैं उनको आनकोलोजिस्ट कहा जाता है । कैंसर का निदान एक्स-किरणों, सीटी स्कैन, एम.आर.आई. स्कैन, पी.ई.टी. रेडियोधर्मीस्कैनिंग तथा अल्ट्रासाउण्ड स्कैन द्वारा किया जाता है । इसके अतिरिक्त एफ.एन.ए.सी. तथा बायोप्सी द्वारा भी कैंसर का निदान किया जाता है । कैंसर उपचार के कई तरीके अपनाये जाते हैं । इनमें से शल्य चिकित्सा, विकिरण विधि, रसायन चिकित्सा, जैव चिकित्सा, हारमोन चिकित्सा आदि मुख्य है । शल्य चिकित्सा में शरीर के उस भाग को निकाल दिया जाता है जिसमें कैंसर प्रारंभ हुआ है । यह चिकित्सा की सर्वोत्तम विधि है । विकिरण समस्थानिक द्वारा कैंसर ग्रस्त कोशिकाआें को इस प्रकार नष्ट किया जाता है कि सामान्य कोशिकांए अप्रभावित रहे इससे अर्बुद सिकुड़ जाता है । इस क्रिया में कैंसर ग्रस्त कोशिकाआें के डी.एन.ए. को पूर्णता मार दिया जाता है । इस विधि में कैंसर कोशिकाएं नष्ट होती हैं साथ ही स्वस्थ्य कोशिकाएं भी नष्ट हो जाती है ।
    रसायन चिकित्सा में विकिरण उपचार के पहले या उसी समय प्रति कैंसर औषधियों का प्रयोग किया जाता है । यह चिकित्सा कैंसर के उपचार हेतु अत्यन्त सफल है । दवाइयाँकभी-कभी गोलियों के रूप में ली जाती है लेकिन सामान्यत: इन्जेक्शन के रूप में शिराआें द्वारा दी जाती है । इस विधि में लाभ यह है कि औषधि एक स्थान पर नहीं रहती बल्कि पूरे शरीर में जाती है तथा अर्बुद को सिकोड़ती है जिससे शल्य चिकित्सा सरल हो जाती है । पार्श्व प्रभाव के रूपमें इससे कैंसर कोशिकाआें के अतिरिक्त मुंह, भोजन नली, बोन मेरो, और स्वस्थ कोशिकाएं भी प्रभावित होती हैं जिससे उल्टी होना, बालों का गिरना, पेचिस तथा रक्त गणना कम हो जाती है । लेकिन शीघ्र ही स्वस्थ्य कोशिकाआें में सुधार हो जाता है । जैविक उपचार में प्रतिरक्षा तन्त्र द्वारा कैंसर कोशिकाआें को अवरोधित किया जाता है अथवा मार दिया जाता है । मोनोक्लोनल प्रतिरक्षी को अंत:क्षेपण द्वारा संक्रमति स्थान पर दिया जाता है जिससे सूजन आती है तथा अर्बुद सिकुड़ने लगता है ।
    हारमोन उपचार में कैंसर कारक हार्मोन के उत्पादन को उलट दिया जाता है जिससे कैंसर कोशिकाएं अवरोधित होती है या पूर्णत: मर जाती है । कुछ अंगो का जैसे अंडकोष, अधिवृक, पियूषिका जो कि हारमोन पैदा करते है को निकाल दिया जाता है जिससे कैंसर कारक हारमोन का उत्पादन बन्द हो जाता है या नियंत्रित हो जाता है । उदाहरणार्थ हारमोन टेस्टोस्टेरान पौरूष ग्रंथि के कैंसर को बढ़ावा देता है । यदि किसी औषधि द्वारा इस हारमोन उत्पादन को रोक दिया जाय जो कि अण्डकोष से आता है, तो पौरूष ग्रंथि का कैंसर रूक सकता है । लेकिन इसके भी पार्श्व प्रभाव होते हैं। स्त्री हारमोन एस्ट्रोजेन तथा प्रोजेस्टेरान स्तन कैंसर को बढ़ावा देते हैं । प्राय: इस केंसर को रोकने में एस्ट्रोजेन का स्तर कम किया जाता है कि कैंसर को रोकता है । इसके लिए अधिकतर प्रयोग होने वाली औषधि, टेमोक्सीकेन या फारेस्टोन होती है । जीन उपचार में कैंसर पैदा करने वाले जीनों को हटाकर दूसरे जीनों का प्रत्यारोपण किया जाता है ।
    कैंसर एक जानलेवा कष्टकारी बीमारी है जिससे बचने का कोई कारगर उपाय नहीं लेकिन जीवन शैली में परिवर्तन लाने तथा खान पान में संशोधन करके कुछ हद तक कैंसर होने की संभावना को कम किया जा सकता है । लम्बे अध्ययन से यह ज्ञात हो चुका है कि फल तथा सब्जियाँ कैंसर रोकने में सहायक हो सकते हैं । खाद्य पदार्थो के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि स्वास्थ्य कारक भोजन में फल एवं सब्जियों का उचित समावेश किया जाये । जो लोग फल तथा सब्जियाँ नहीं खाते हैं उनको कैंसर होने की संभावना उनकी तुलना में जो फल तथा सब्जियाँ खाते हैं दो गुना हो सकती है ।
    एक विषद अध्ययन में निम्नवत सावधानियाँ बरतने पर कैंसर से बचाव किया जाना बताया गया है । राष्ट्रीय कैंसर संस्थान द्वारा यह बताया गया है कि फलों तथा सब्जियों का सेवन दिन में लगभग पाँच बार किया जाय तो कैंसर की संभावना कम होती है । पशुआेंके मांस के स्थान पर मुर्गा, मछली, अखरोट, बादाम आदि फलीदार पदार्थ तथा दूध से बने पदार्थ का अधिक सेवन किया जाये । शराब तथा तम्बाकू का प्रयोग कम से कम किया जाये । अनाजों को जितना संभव हो उतना उनके प्राकृतिक रूप मेंलिया जाय । इसके साथ ही स्तनों का स्वयं निरीक्षण भी करते रहना चाहिए । युवावस्था में शरीर की भार वृद्धि को बचाना चाहिए । राष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान संस्था ने विषद अध्ययन में पाया कि मोटापा तथा कैंसर में गहन संबंध हैं । यदि शरीर का भार कम कर लिया जाये तो कोलन, स्तन कैंसर, गुर्दा कैंसर तथा गले के कैंसर से रक्षा हो सकती है । स्तन कैंसर से बचे मरीजों के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि निदान के उपरांत व्यायाम करने से कैंसर से मृत्यु तथा पुनरावृत्ति में कमी की जा सकती है । इसी प्रकार कोलन कैंसर में भी शारीरिक व्यायाम द्वारा इसके घातक परिणाम तथा पुनरावृत्ति को रोका जा सकता है ।
    अच्छा स्वास्थ्यवर्धक जीवन जीने के साथ ही प्रत्येक व्यक्ति को इसका ज्ञान होना चाहिए कि कैंसर उपचार के लाभ तथा हानि क्या हो सकते हैं । कैंसर के भय को जीने के उत्साह से जीतना चाहिए । प्रतिदिन नई खोज की जा रही है जिससे कैंसर का उपचार किया जा सके ।

जानें क्या है सर्विक्स कैंसर



कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसका नाम सुनते ही लोग भयभीत हो जाते हैं. वैसे तो, कैंसर किसी को भी हो सकता है. पर कुछ खास तरह के कैंसर जो, सिर्फ स्त्रियों को ही होते हैं, उनमें से एक है  गर्भाशय ग्रीवा का कैंसर. गर्भाश्य ग्रीवा के कैंसर को सर्विक्स कैंसर भी कहा जाता है. यह कैंसर होता कैसे है यह जानने के लिए स्त्री के शरीर की आंतरिक संरचना को समझना बहुत जरूरी है. वैजाइना के आगे गर्भाशय का मुख स्थित होता है. इसे ही गर्भाशय ग्रीवा अर्थात सर्विक्स कहा जाता है. गर्भाशय ग्रीवा में कैंसर कोशिकाओं के बनने से ही सर्विक्स कैंसर होता है. सर्विक्स के क्षेत्र में कोई संक्रमण हो या कैंसर कोशिकाएं बनने लगें तो स्त्री की प्रजनन क्षमता पर बुरा असर पड़ता है. हो सकता है, स्त्री कभी भी गभर्धारण न कर पाए. यही नहीं, सर्विक्स के क्षेत्र में कैंसर कोशिकाओं को नियंत्रित न किया जाए तो कैंसर कोशिकाएं धीरे-धीरे गर्भाशय के क्षेत्र में भी बड़ी आसानी से फैल जाती हैं और स्त्री की मौत भी हो सकती है. औरतों को होने वाले कैंसर में करीब 40 प्रतिशत सर्विक्स कैंसर के मामले होते हैं.यदि मैलिगनेंट गांठें सर्विक्स के क्षेत्र में हों तो स्त्री को  सर्विक्स कैंसर हो जाता है.
प्रमुख लक्षण
अंम्बेडकर अस्पताल के कैसर विभागाध्यक्ष डॉ. विवेक चौधरी सर्विक्स कैंसर की शुरुआत में प्रकट होने वाले लक्षणों के बारे में कहतें हैं, ह्यदो मासिक चक्रों के बीच में रक्तस्त्राव होना, वैजाइना से सफेद स्त्राव होना, वैजाइना की सफाई के  समय खून आना, पेट के निचले हिस्से में दर्द होना आमतौर पर सर्विक्स कैंसर के लक्षण होते हैं. यदि किसी स्त्री को ऐसा हो तो तत्काल किसी अनुभवी स्त्री रोग विशेषज्ञा को दिखाना चाहिए. इतना ही नहीं, यदि स्त्री को सहवास के दौरान खून आए तो यह भी सर्विक्स कैंसर का संकेत हो सकता है.
क्या है सर्विक्स कैंसर की वजह
सर्विक्स कैंसर के कारणों को समझना बेहद जरूरी है. आवश्यक साफ-सफाई नहीं बरतने से इस कैंसर का खतरा सबसे अधिक होता है.  चूंकि स्त्री के प्रजनन तंत्र की संरचना बहुत जटिल और सूक्ष्म होती है. अत: यदि स्त्रियां अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता में जरा भी लापरवाही करें तो पुरुषों की अपेक्षा उनमें संक्रमण जल्दी हो जाता है. 
सर्विक्स कैंसर के साथ सबसे खतरनाक बात तो यह है कि इसके अधिकांश मामलों में कैंसर अंतिम अवस्था में पहुंच चुका होता है. जहां स्त्री का इलाज और उसकी जान बचा पाना चिकित्सक के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है.18 वर्ष से कम उम्र में विवाह, अधिक बच्चे होना, धूम्रपान करना और बिना डॉक्टर की सलाह के गर्भनिरोधक गोलियों का सेवन भी सर्विक्स कैंसर का कारण बन सकता है. यही नहीं, यौन संक्रामक रोग और खास तरह का एचपीवी (ह्यूमन पैपिलोमा वायरस) भी मूलत: सर्विक्स के आसपास के क्षेत्र की कोशिकाओं के अनियंत्रित गुणात्मक विखंडन की प्रक्रिया को उकसाता है. लेकिन सर्विक्स कैंसर का पता लगाने वाली सबसे महत्वपूर्ण और निर्णायक जांच है- पेप्सस्मीयर टेस्ट.
क्या है पेप्सस्मीयर टेस्ट - पेप्सस्मीयर टेस्ट के तहत महिला के योनि से निकलने वाले द्रव को चम्मचनुमा किसी चीज की सहायता से खुरच कर निकाल लिया जाता है. इस द्रव को कांच की परखनली में इकट्ठा करके सूक्ष्मदर्शी से इसकी जांच की जाती है. इस जांच से यह जानकारी मिल जाती है कि योनि से निकाले गए द्रव की कोशिकाएं खतरनाक प्रकृति की हैं या नहीं. पेप्सस्मीयर के परिणामों को तीन भागों में बांटा जाता है-
निगेटिव - इसके अंतर्गत माना जाता है कि पेप्सस्मीयर टेस्ट में कैंसरकारी कोशिकाएं नहीं पाई गई हैं. फिर भी हर विवाहित स्त्री को प्रत्येक तीन साल के अंतराल में पेप्सस्मीयर टेस्ट करवाना चाहिए. जिन औरतों की उम्र 65 वर्ष के आसपास हो और पेप्सस्मीयर की रिपोर्ट लगातार निगेटिव आती रही हो तो उन्हें आगे यह जांच कराने की कोई जरूरत नहीं होती.
अनिश्चय - इसके अंतर्गत पेप्सस्मीयर टेस्ट में इस बात के ठोस प्रमाण नहीं मिले हैं, जिससे पता चले कि योनि से निकलने वाले द्रव में कैंसरकारी कोशिकाएं हैं ही. इसलिए अंतिम निर्णय पर पहुंचने से पहले फिर से यही जांच किए जाने की आवश्यकता है. संभव है, कि स्लाइड से प्राप्त कोशिकाओं में अत्यंत कम मात्रा में कोई दोष पाया गया हो, जो योनि में किन्हीं अन्य कारणों से हुई सूजन और संक्रमण आदि कारणों से भी हो सकता है. परंतु, इस स्थिति में इलाज और हर तीसरे और छठे महीने पेप्सस्मीयर टेस्ट कराते रहना जरूरी है ताकि पेप्सस्मीयर टेस्ट में थोड़ा भी पॉजिटिव संकेत मिलते ही उचित इलाज आरंभ किया जा सके. पेप्सस्मीयर टेस्ट रिपोर्ट में अनिश्चय की स्थिति में यदि डॉक्टर को जरा भी संदेह होता है तो वैजाइना से प्राप्त द्रव की बायोप्सी करना जरूरी होता है. यहां यदि डिस्प्लेजिया या पहले चरण का कैंसर पाया गया तो माइक्रोस्कोप से जांच की जाती है.
पॉजिटिव - इसका अर्थ है कि पेप्सस्मीयर जांच में गंभीर कोशिका दोष है और सर्विक्स कैंसर के संकेत मिले हैं. इसलिए ऐसी स्थिति में बायोप्सी अति आवश्यक है.
बीमारी के प्रमुख चरण - सर्विक्स कैंसर की स्थिति में इलाज को भी कैंसरकारी कोशिकाओं की उग्रता को देखते हुए चार चरणों में बांटा जाता है-
स्टेज वन - इसका अर्थ है कि कैंसर सिर्फ श्रोणि प्रदेश तक ही सीमित है और सजर्री द्वारा गर्भाश्य को निकाल देने से भविष्य में कैंसर होने की संभावना को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाता है। लेकिन इसके बाद स्त्री गभर्धारण नहीं कर पाती.  यदि डॉक्टर को स्थिति थोड़ी भी गंभीर नजर आती है तो   सजर्री द्वारा गर्भाशय निकाल दिए जाने के बाद भी रेडियोथेरेपी द्वारा कैंसर कोशिकाओं को जला दिया जाता है.
स्टेज टू ए और स्टेज टू बी - इस स्थिति में पहुंचने का अर्थ है कि कैंसर कोशिकाएं वैजाइना के आसपास के हिस्सों में भी फैल गई हैं. कैंसर कोशिकाओं ने आसपास के अंगों को कितना अधिक जकड़ लिया है, इसी आधार पर सर्विक्स कैंसर के लक्षणों को स्टेज टू ए और टू बी दो भागों में बांटा जाता है. साथ ही यह भी तय किया जाता है कि मरीज को सिर्फ कीमोथेरेपी, रेडियोथेरेपी या दोनों की जरूरत है.
स्टेज थ्री - इस अवस्था में कैंसर कोशिकाएं पेल्विक वाल तक पहुंच जाती हैं.   स्टेज फोर:इस अवस्था में कैंसर कोशिकाएं ब्लैडर और रेक्टम को भी अपने चंगुल में ले लेती हैं. यह गंभीरतम स्थिति होती है.स्टेज थ्री और स्टेज फोर में रेडियोथेरेपी और कीमोथेरेपी साथ-साथ दी जाती है. इन दोनों ही अवस्थाओं में सजर्री नहीं की जा सकती. इन दोनों ही अवस्थाओं में कैंसर कोशिकाएं अंदर-अंदर इतनी दूर तक फैल चुकी होती हैं कि आॅपरेशन की कोई अहमियत नहीं रह जाती. सर्विक्स कैंसर स्त्री के शरीर को पूरी तरह भीतर-भीतर खोखला बना देता है। यदि सही समय पर सही इलाज शुरू हो गया और अगले पांच वर्षो में उस स्त्री में दोबारा कैंसर के लक्षण प्रकट नहीं हुए तो स्टेज वन कैंसर के 80-90 प्रतिशत मामलों में माना जाता है कि स्त्री पूरी तरह ठीक हो गई है. लेकिन एक बार सर्विक्स कैंसर का इलाज पूरा होने के बाद भी प्रत्येक तीन माह पर स्टेज टू सर्विक्स कैंसर का सफल इलाज करा चुकी करीब 65-75 प्रतिशत स्त्रियों में यदि पांच वर्षो तक कैंसर के लक्षण नहीं मिले तो वह हमेशा के लिए सर्विक्स कैंसर से मुक्त मानी जाती हैं. लेकिन स्टेज थ्री और स्टेज फोर की अवस्था गंभीर मानी जाती है. स्टेज थ्री कैंसर सर्विक्स वाली 50 प्रतिशत और स्टेज फोर में पहुंचने वाली सिर्फ 20-25 प्रतिशत स्त्रियों में ही अगले पांच वर्षो में कैंसर दोबारा प्रकट नहीं होने पर ये स्त्रियां कैंसरमुक्त मानी जा सकती हैं.यदि स्टेज वन कैंसर है और स्त्री लगभग पूरे समय की गर्भवती है तो चिकित्सक बच्चे के जन्म की अनुमति दे देते हैं लेकिन प्रसव के तुरंत बाद आवश्यक चिकित्सा अनिवार्य हो जाती है.
कुछ खास बातें
जननांगों की आवश्यक स्वच्छता का ध्यान रखकर इस प्रकार के कैंसर से बचा जा सकता है. खास तौर से पीरियड के दौरान अंत:वस्त्रों की सफाई का विशेष ध्यान रखना चाहिए और जरूरत पड़ने पर उसे बदलते रहना चाहिए.   हमेशा अच्छी क्वालिटी के सैनिटरी नैपकिन का ही इस्तेमाल करना चाहिए. सर्विक्स कैंसर से बचने के लिए यह जरूरी है कि आपके साथ आपके पति भी अपनी व्यक्तिगत स्वच्छता का पूरा
ध्यान रखें.    
विकसित देशों में तो स्त्रियों में पर्याप्त जागरूकता और स्वास्थ्य सुविधाओं के कारण यह कैंसर स्त्रियों को होने वाले कैंसरों की सूची में छठे-सातवें स्थान पर चला गया है जबकि भारत की स्त्रियां अब भी सर्विक्स कैंसर से बदहाल हैं क्योंकि भारतीय स्त्रियों में अपने स्वास्थ्य के प्रति अपेक्षित जागरूकता का अभाव है.

ब्‍लैडर कैंसर के लक्षण , ब्‍लैडर कैंसर क्‍या है

ब्‍लैडर कैंसर के लक्षण गुर्दे के संक्रमण से मिलते जुलते होते हैं और मूत्राशय में संक्रमण और ब्‍लैडर कैंसर के लक्षण भी एक जैसे लगते हैं। ऐसे में इसके लक्षणों को पहचाना होगा।

bladder cancer ke lakshan



































ब्लैडर कैंसर के लक्षणों में यूरीन के दौरान जलन होना, यूरीन करने में दिक्कत होना, खुलकर यूरीन न आना, बार-बार दर्द का बढ़ जाना, रक्तस्राव होना इत्यादि शामिल हैं।

मूत्राशय की भीतरी परत में कोशिकाओं की असामान्य वृद्धि को ब्‍लैडर कैंसर कहते है जो कि बाहरी परत तक फैलता है। 40 वर्ष की उम्र के बाद मूत्राशय का कैंसर आम है परन्‍तु यह युवा लोगों में बहुत कम देखने को मिलता हैं। ब्लैडर कैंसर प्रॉस्टेट ग्रंथि के बढ़ने, मूत्रमार्ग में संकुचन, गर्भ के समय आने वाली समस्याएं, मूत्राशय में पथरी, गर्भपात, किसी बीमारी के कारण इत्यादि ब्लैडर इंफेक्शन के जिम्मेदार है।

वैसे तो ब्लैडर कैंसर महिलाओं और पुरूषों दोनों को ही हो सकता है। लेकिन महिलाओं में यह कैंसर ज्‍यादा देखने को मिलता है। आइए जानें ब्‍लैडर कैंसर के लक्षणों के बारे में।


ब्‍लैडर कैंसर के लक्षण 

यूरीन के साथ रक्त का आना (हीमैट्यूरीया)
यह लक्षण ब्लैडर कैंसर का पहला लक्षण है और यह लगभग 80 से 90 प्रतिशत लोगों में पाया गया है। हीमैट्यूरीया यूरीन में रक्‍त के रंग का दिख सकता है या जंग के रंग का दिख सकता है। हीमैट्यूरीया की जांच यूरीन की जांच कर उस स्थिति में भी की जा सकती है जबकि मरीज़ को ऐसे कोई लक्षण ना दिखें।


दर्दनाक यूरीनेशन या यूरीन के दौरान जलन (डिसयूरीया)
यह लक्षण यूरीनेशन की फ्रिक्वेंसी या यूरीनेशन की तीव्र इच्छा से बहुत अलग है और यह पुरूषों में प्रोस्‍ट्रेट बीमारी के लक्षण भी दर्शाता है। सामान्य से अधिक बार यूरीन का आना भी इस बीमारी के लक्षण हैं।

अन्‍य लक्षण
अगर ब्‍लैडर कैंसर का शुरू में निदान न किया जाए तो बाद में इसमें यह सब लक्षण भी दिख सकते हैं जैसे-
  • पीठ के निचले हिस्से में दर्द की अनुभूति।
  • निचले पेट में एक गांठ।
  • यू‍रीन या यूरीन के पारित होने में गंभीर मुश्किल या अभाव।
  • कभी कभी कैंसर के हड्डी में मेटास्टेसिस होने पर और मंद दर्द।

ब्‍लैडर कैंसर क्‍या है


ब्‍लैडर में असामान्य कोशिकाओं की अनियंत्रित वृद्धि को ब्‍लैडर कैंसर कहते है। ब्लैडर की बाहरी दीवार की मांसपेशियों की परत को सेरोसा कहते हैं जो कि फैटी टिश्‍यू, एडिपोज़ टिश्यूज़ या लिम्फ नोड्स के बहुत पास होता है।


bladder cancer kya hai



ब्‍लैडर वो गुब्बारेनुमा अंग है जहां पर यूरीन का संग्रह और निष्कासन होता है। ब्लैडर की आंतरिक दीवार नये बने यूरीन के सम्पर्क में आती है और इसे मूत्राशय की ऊपरी परत कहते हैं। यह ट्रांजि़शनल सेल्स द्वारा घिरी होती है जिसे यूरोथीलियम कहते हैं।


ब्लैडर कैंसर महिलाओं और पुरूषों दोनों को ही हो सकता है। लेकिन महिलाओं में यह कैंसर अधिक होता है। ब्लैडर कैंसर के कई कारण है, प्रॉस्टेट ग्रंथि का बढ़ना, मूत्रमार्ग में संकुचन होना, गर्भ के समय आने वाली समस्याएं, मूत्राशय में पथरी का होना, गर्भपात होना, किसी बीमारी के कारण इत्यादि ब्लैडर इंफेक्शन के जिम्मेदार है।

कोशिकाओं की परत के नीचे मांसपेशियों की एक परत होती है जो कि ब्लैडर के सिकुड़ने के साथ यूरीन को निष्कासित करती है जिससे यूरीन यूरेथ्रा नामक ट्यूब से निष्कासित किया जाता है।

ब्लैडर की बाहरी दीवार की मांसपेशियों की परत को सेरोसा कहते हैं जो कि फैटी टिश्‍यू, एडिपोज़ टिश्यूज़ या लिम्फ नोड्स के बहुत पास होता है। ब्लैडर कैंसर ब्लैडर की परत से शुरू होता है। लगभग 70 से 80 प्रतिशत ब्लैडर कैंसर के मरीज़ों में कैंसर का पता तभी लग जाता है जबकि यह बाहर सीमित होता है, बाहरी सतह में होता है और ब्लैडर की दीवार की आंतरिक सतह में होता है।

कैंसर जब ब्लैडर की बाह्य दीवार में शुरू होता है तो इसे सुपरफीशियल कैंसर कहते हैं और यह असामान्य कोशिकाओं में आइसोलेटेड पैच की तरह दिखता है। अगर ब्लैडर की आंतरिक दीवार पर उंगलीनुमा निकला हुआ हिस्सा पाया गया तो इसे पैपिलरी ट्रांजिंशनल सेल कैंसर कहते हैं।

कभी–कभी ट्यूमर का पता तब लगता है जबकि यह गहरे तौर पर ब्लैंडर की आंतरिक दीवार से लेकर लिम्फ नोड्स और दूसरे अंग में फैल चुका होता है।

ब्‍लैडर कैंसर का एक और प्रकार है जिसे कि कारसिनोमा इन सीटू कहते हैं, जिसका अर्थ है कि यह कैंसर सिर्फ उसी स्थान पर रहता है जहां पर इसकी शुरूआत हुई होती है। हालांकि यह कैंसर ब्लैडर को बहुत गहराई से नहीं प्रभावित करता है लेकिन इसके कुछ लक्षण हैं, यूरीनेशन के दौरान जलन होना। ऐसा भी हो सकता है कि चिकित्सक द्वारा साइटोस्कप से जांच करने के बाद भी यूरोलोजिस्ट इस बीमारी को ना पकड़ पाये। जांच के लिए ब्लैडर की बाह्य दीवार का जो हिस्सा लाल लगे वहां की बायोप्सी करनी होती है।


इसका पता एक दूसरी जांच से भी लगाया जाता है जिसे कि यूरीन साइटालाजी कहते हैं और इसमें यूरीन की कोशिकाओं की जांच की जाती है। इस जांच में यूरीन का एक नमूना लिया जाता है और माइक्रोस्कोप के अंदर उसकी जांच कर कैंसर की कोशिकाओं का पता लगाया जाता है।

ब्लैडर कैंसर के तीन प्रकार हैं और सभी में अलग–अलग तरह की कोशिकाएं होती हैं
1. लगभग 90 प्रतिशत ब्लैडर के कैंसर ट्रांजि़शनल सेल कार्सिनोमाज़ कहलाते हैं।
2. 6 से 8 प्रतिशत स्क्‍वामस सेल कार्सिनोमा।
3. 2 प्रतिशत एडेनोकार्सिनोमाज़ होते हैं।

एक और प्रकार का परजीवी संक्रमण जिसे कि सीज़ोसोमियासिस कहते हैं वो ब्लैडर कैंसर का खतरा बढ़ाता है। वो मरीज़ जिनमें लम्बे समय से ब्लैडर की पथरी है उनमें ब्लैडर की दीवार पर सूजन और लम्बे समय तक जलन के कारण कैंसर का खतरा बढ़ जाता है। वो मरीज़ जिनमें पहले कभी ब्लैडर कैंसर हो चुका है उनमें इस बीमारी के दोबारा होने की आशंका होती है।




चिकनगुनिया और इसकी जटिलताएं

चिकनगुनिया और इसकी जटिलताएं


रोग ठीक हो जाता है, लेकिन कई बार उसके प्रभाव लंबे समय तक कायम रहते हैं। चिकनगुनिया भी ऐसी ही बीमारी है, जो आमतौर पर सप्‍ताह भर में ठीक हो जाती है, लेकिन अपने पीछे कई ऐसे निशान छोड़ जाती है, जिन्‍हें जाने में काफी वक्‍त लगता है।

लेकिन उसका असर शरीर पर लंबे समय तक रहता है। चिकनगुनिया वायरस की जटिलताएं कहीं न कहीं डेंगू वायरस से भी मिलती-जुलती हैं। आइए जाने चिकनगुनिया वायरस शरीर पर अपना क्याह प्रभाव छोड़ जाता है।

  • चिकनगुनिया का मुख्य लक्षण जोड़ों में दर्द होना है। चिकनगुनिया बुखार 2 से 12 दिन तक रहता है लेकिन रोगी को इससे उबरने के लिए महीनों लग जाते हैं। कभी-कभी ये समय 6 महीने तो कभी 1 से 2 साल भी हो सकता है। दरअसल, इस वायरस से शरीर बहुत कमजोर हो जाता है जिसको बाद में उबरने में समय लगता है और जोड़ों का दर्द सही होने में समय लग जाता है।
  • चिकनगुनिया वायरस से पीडि़त व्यक्ति कुछ सप्ताह तक हर समय थकान से परेशान रहता है। 

  • कुछ रोगियों को हफ्तों या महीनों तक असहनीय दर्द, गठिया दर्द आदि की शिकायत भी हो सकती है।
  • कई रोगियों को चिकनगुनिया के लक्षणों के आधार पर कई तरह की मस्तिष्कर की समस्यातएं, गुर्दे की बीमारियां तथा इसी तरह की अन्य  गंभीर बीमारियां हो सकती है।
  • कई रोगियों को इस वायरस के कारण जीवनभर किसी भी अन्य बीमारी से लड़ने की क्षमता कम हो जाती है।
  • शरीर में पानी की कमी हो सकती है।
  • इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन, निमोनिया, सांस संबंधी बीमारियां आदि चिकनगुनिया के प्रभाव से हो सकती हैं।

चिकनगुनिया के घरेलू उपचार

चिकनगुनिया के घरेलू उपचार


यूं तो हमेशा से ही डॉक्टर्स हेल्दी और फिट रहने की सलाह देते हैं और उसके लिए व्यायाम, एक्सरसाइज-योगा आदि करने के साथ ही हेल्दी डाइट लेने की भी सलाह देते हैं, लेकिन जब आप बीमार हों तो आपको अपनी सेहत का खासतौर पर खयाल रखने की जरूरत होती है। 

सूप और सेब
चिकनगुनिया का इलाज अभी तक खोजा नहीं जा सका है। लेकिन, फिर भी डॉक्‍टरों का कहना है कि इस बीमारी से उबरने में आहार की विशेष भूमिका होती है। यदि आपका आहार सही हो और इसके साथ ही आप कुछ घरेलू उपाय अपनाएं तों आप इस बीमारी के प्रकोप को काफी हद तक कम कर सकते हैं।
इस बीमारी का सबसे अच्‍छा इलाज तो यही है कि इसे होने ही न दिया जाए। लेकिन, फिर भी आप अगर इस बीमारी के शिकार हो गए हैं, तो बेहतर है कि आप स्‍वयं को इसके प्रभाव से बचा सकते हैं।
जहां तक घरेलू उपायों की बात है, तो कई लोगों की नजर में ये अधिक सुरक्षित और कारगर होते हैं। साथ ही इन उपायों को किफायती भी माना जाता है। ये घरेलू उपाय प्रकृति के साथ सामंजस्‍य बैठा कर काम करते हैं। इसलिए ये बीमारी से पूरी तरह राहत दिलाने की पद्धति पर काम करते हैं। और साथ ही मानव शरीर को उस बीमारी से लड़ने के लिए तैयार भी करते हैं ये घरेलू नुस्‍खे। ये इनसान की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाते हैं और साथ ही उसे बीमारी के दुष्‍प्रभाव से उबरने में सहायता भी प्रदान करते हैं।

चिकनगुनिया होने पर आप इन घरेलू उपायों को आजमा सकते हैं-

पानी अधिक पिएं
पानी आपके शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने में मदद करता है। चिकनगुनिया होने पर आपके शरीर में पानी की कमी हो जाती है। ऐसे में अगर आप पर्याप्‍त मात्रा में पानी नहीं पिएंगे तो आपको डिहाइड्रेशन यानी निर्जलीकरण की समस्‍या हो सकती है, जो आपके लिए अच्‍छा नहीं होगा।

    आराम करें
    चिकनगुनिया के कारण आपका शरीर काफी थक जाता है। इससे शरीर में काफी कमजोरी आ जाती है। इस कमजोरी को दूर करने के लिए शरीर को पर्याप्‍त मात्रा में आराम करना जरूरी होता है। आराम करने से आपकी मांसपेशियों को राहत मिलती है और उन्‍हें बीमारियों के दुष्‍प्रभाव से उबरने का पर्याप्‍त समय मिल जाता है।


    चॉकलेट यानी मीठा इलाज
    चिकनगुनिया होने पर इसका असर व्‍यक्ति के रक्‍तचाप पर भी पड़ता है। व्‍यक्ति का रक्‍तचाप कम होने से व्‍यक्ति का स्‍वभाव भी बिगड़ जाता है। इसके साथ ही उसे काफी पसीना आता है और वह काफी थका हुआ महसूस करता है। ऐसे में चॉकलेट खाने से उसे राहत मिलती है। चॉकलेट में मौजूद तत्‍व और ग्‍लूकोज शरीर में घुलकर व्‍यक्ति को आराम और ऊर्जा प्रदान करते हैं। 

    दूध और डेयरी उत्‍पाद
    दूध से बने उत्पाद, दूध-दही या अन्य। चीजों का सेवन भी खूब करना चाहिए।
    नीम के पत्ते
    नीम के पत्तों को पीस कर उसका रस निकालकर चिकनगुनिया से ग्रसित व्यक्ति को दें।

    चिकनगुनिया का आयुर्वेदिक इलाज

    अपने गुणों के कारण आयुर्वेद को पांचवां वेद कहा जाता है। आयुर्वेद में ऐसे कई रोगों को इलाज मौजूद होने की बात कही जाती है, जिनके बारे में आधुनिक चिकित्‍सीय विज्ञान अभी तक मौन है। चिकनगुनिया भी उनमें से एक है। आयुर्वेदिक औषधियों के जरिये चिकनगुनिया का इलाज कैसे किया जा सकता है, जानने के लिए यह लेख पढ़ें।

    आयुर्वेदिक इलाज
    आयुर्वेद एक परंपरागत भारतीय चिकित्‍सा पद्धति है। यह पद्धति अब न केवल भारत अपितु विश्व भर में अपनी साख बना चुकी है। सारी दुनिया में करोड़ों लोग आयुर्वेदिक चिकित्‍सीय पद्धति का फायदा उठाते हैं। आयुर्वेदिक चिकित्‍सा में मुख्‍यत: शाकाहारी औ‍षधियां ही शामिल होती हैं, ऐसे में इन दवाओं का सेवन सामान्‍यत: सुरक्षित ही होता है।


    चिकनगुनिया यानी संधि-ज्‍वर
    आयुर्वेद में चिकनगुनिया को संधि-ज्‍वर कहा जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है 'जोड़ों का बुखार।' स‍ंधि ज्‍वर और चिकनगुनिया के लक्षणों में काफी सामानता देखी जाती है। और इसलिए आयुर्वेदिक इलाज के जरिये इस बीमारी में राहत पायी जा सकती है। कुछ लोगों का मानना है कि चिकनगुनिया के इलाज में आयुर्वेदिक तरीके काफी कारगर होते हैं। हालांकि, आधुनिक चिकित्‍सा विज्ञान में अभी तक इस बीमारी का कोई ईलाज खोजने का दावा नहीं किया गया है, लेकिन फिर भी इस विश्वास के साथ कई लोग आयुर्वेदिक पद्धति के जरिये चिकनगुनिया का इलाज करवाते हैं।

    'वात दोष है चिकनगुनिया'
    आयुर्वेद में रोग की मुख्‍य वजह मानी जाती हैं। वात, कफ और पित्त। अब अगर आयुर्वेदिक नजरिये से देखें, तो चिकनगुनिया को 'वात दोष' कहा जाता है। वात रोग होने के कारण रोगी को ऐसा भोजन अपनाने की सलाह दी जाती है, जो वात बढ़ने से रोके।

    तरल पदार्थों का सेवन करें
    इसमें रोगी को अपने आहार में आवश्‍यक परिवर्तन करने की सलाह दी जाती है। रोगी को आहार में तरल पदार्थों की मात्रा बढ़ाने का परामर्श दिया जाता है। इसके साथ ही उसे कहा जाता है कि वह सब्जियों का सेवन भी अधिक करे। चिकनगुनिया के रोगी को चाहिए कि वह तैलीय भोजन, चाय व कॉफी का सेवन कम करे।

    मसाज दिलाये दर्द से राहत

    आयुर्वेदिक मसाज को चिकनगुनिया के कारण जोड़ों में होने वाले दर्द में मददगार समझा जाता है। आयुर्वेदिक मसाज में कई औषधियों के अर्क को तेल में मिलाकर उससे रोगी के शरीर की मसाज की जाती है। इससे रोगी को दर्द में तो राहत मिलती ही है साथ ही पहले से अधिक ऊर्जावान महसूस करने लगता है।

    आयुर्वेदिक दवाएं
    इस बुखार से लड़ने के लिए आमतौर पर आयुर्वेद में विलवदी गुलिका , सुदर्शनम गुलिका और अमृतरिष्ठाव दिया जाता है। लेकिन, इन दवाओं को आजमाने से पहले किसी अनुभवी आयुर्वेदिक विशेषज्ञ से परामर्श करना आवश्‍यक है। क्‍योंकि अनुभवी चिकित्‍सक ही आपको बता पाएगा कि आपको इन दवाओं का कितनी मात्रा में सेवन करना चाहिए। और साथ ही इन दवाओं के सेवन के साथ आपको किस प्रकार की अन्‍य सावधानियां बरतनी पड़ेंगी।

    प्राकृतिक जड़ी बूटियां
    तुलसी, गाजर, अंगूर आदि को चिकनगुनिया और इससे होने वाले दर्द में काफी राहत पहुंचाने वाला माना जाता है। क्‍योंकि ये सब प्राकृतिक औषधियां हैं, इसलिए इन्‍हें आजमाने में कोई हानि नहीं है।

    पाउडर और चूर्ण
    चिकनगुनिया के इलाज में आयुर्वेदिक चूर्ण इस्‍तेमाल करने की भी सलाह दी जाती है। योगीराज गुगुलू और सुदर्शन चूर्ण को इस बुखार में काफी उपयोगी माना जाता है। अर्जुन छाल भी इस वायरल काफी लाभदायक मानी जाती है। इसके साथ ही हल्दी, आंवला, लहसुन आदि के पाउडर भी इस रोग से उबरने में सहायता प्रदान करते हैं।

    मंगल दोष उपाय : मंगल दोष शांति : Remedies of Manglik Dosha or Kuja Dosha

    मंगल दोष उपाय : मंगल दोष शांति : Remedies of Manglik Dosha or Kuja Dosha

    यहां मंगल दोष निवारण के कुछ उपाय दिए गए हैं।
    ये मंगल दोष के प्रभाव को काम करेंगे और अच्छा परिणाम देंगे :
        प्रतिदिन गणेशजी को गुड़ और लाल फूल चढ़ाएं और पूजा करते हुए 108 बार यह मंत्र पढ़ें ‘ ॐ गं गणपतये नमः’।
        यदि स्वस्थ हों तो हर चार महीने में एक बार मंगलवार को रक्तदान करें।


        मंगल यन्त्र की स्थापना करें और मंगल प्रार्थना करें।
        मंगलवार को सूर्योदय से लेकर अगले सूर्योदय तक का व्रत करें और इस अवधि में सिर्फ फल और दूध ही लें।
        मंगल चंडिका मंत्र का नियमित जाप करें।
        कुम्भ विवाह, विष्णु विवाह और अश्वत्थ विवाह कराएं।
        प्रतिदिन हनुमान चालीसा पढ़ें।
        चिड़ियों को मीठा खिलाएं 

    आप दिनचर्या के दौरान अपनाकर मंगल दोष शांति कर सकते हैं -

    ज्योतिष विज्ञान के अनुसार मंगल ग्रह दोष से मिलने वाली रोग, पीड़ा और बाधा दूर करने के लिए मंगलवार का व्रत बहुत ही प्रभावकारी माना जाता है। किं तु दैनिक जीवन की आपाधापी में चाहकर भी अनेक लोग धार्मिक उपायों को अपनाने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिए यहां मंगलवार के लिए ऐसे उपाय बताए जा रहे हैं, जिनको आप दिनचर्या के दौरान अपनाकर मंगल दोष शांति कर सकते हैं -
    - अगर आपकी कुण्डली में मंगल उच्च का और शुभ हो तो मंगलवार के दिन हनुमान मंदिर में बताशे चढ़ाएं और बहते जल या नदी में बहा दें। मंगल दोष के बुरे असर से बचाव होगा।

    - घर से काम पर निकलते समय भिखारियों को मीठी रोटी दे दें।
    - बड़ या बरगद की जड़ और मिट्टी में मीठा दूध मिलाकर मस्तक पर तिलक लगाएं। इससे मंगल ग्रह की पीड़ा से हुई पेट की बीमारियों से निजात मिलती है। 
    - रेवड़ी, तिल और शक्कर बहते जल में डालने से मंगल दोष से बने अशुभ और मारक योग से बच सकते हैं।
    - कुंडली के चौथे भाव में मंगल बैठे होने के साथ मंगल दोष मां, सास और दादी को रोगी बना देता है। परिवार में अशांति, दरिद्रता के साथ संतान विवाह में बाधा डालता है। इस दोष निवारण का सरल उपाय है- परिवार के सभी सदस्य कुंए के जल से दातुन करें।
    - मंगल पीड़ा अग्रि भय पैदा करती है। इसका उपाय है देशी शक्कर छत पर बिखेर दें, आग का भय दूर होता है।
     - तंत्र उपायों में श्मशान घाट में शहद से भरी एक कटोरी रखकर आने से मंगल ग्रह दोष से पत्नी और संतान पर आए जीवन का संकट टलता है और लंबी उम्र मिलती है। 
     मंगल दोष के लिए व्रत और अनुष्ठान (Fasts and Rituals to lessen the effect of Manglik Dosha)
    अगर कुण्डली में मंगल दोष का निवारण ग्रहों के मेल से नहीं होता है तो व्रत और अनुष्ठान द्वारा इसका उपचार करना चाहिए. मंगला गौरी और वट सावित्री का व्रत सौभाग्य प्रदान करने वाला है. अगर जाने अनजाने मंगली कन्या का विवाह इस दोष से रहित वर से होता है तो दोष निवारण हेतु इस व्रत का अनुष्ठान करना लाभदायी होता है. जिस कन्या की कुण्डली में मंगल दोष होता है वह अगर विवाह से पूर्व गुप्त रूप से घट से अथवा पीपल के वृक्ष से विवाह करले फिर मंगल दोष से रहित वर से शादी करे तो दोष नहीं लगता है. प्राण प्रतिष्ठित विष्णु प्रतिमा से विवाह के पश्चात अगर कन्या विवाह करती है तब भी इस दोष का परिहार हो जाता है.
    मंगलवार के दिन व्रत रखकर सिन्दूर से हनुमान जी की पूजा करने एवं हनुमान चालीसा का पाठ करने से मंगली दोष शांत होता है. कार्तिकेय जी की पूजा से भी इस दोष में लाभ मिलता है. महामृत्युजय मंत्र का जप सर्व बाधा का नाश करने वाला है. इस मंत्र से मंगल ग्रह की शांति करने से भी वैवाहिक जीवन में मंगल दोष का प्रभाव कम होता है. लाल वस्त्र में मसूर दाल, रक्त चंदन, रक्त पुष्प, मिष्टान एवं द्रव्य लपेट कर नदी में प्रवाहित करने से मंगल अमंगल दूर होता है. 


    मंगल दोष के रामबाण उपाय
    धर्म डेस्क. उज्जैन |
    मंगल दोष के रामबाण उपाय
    ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कई प्रकार के दोष बताए गए हैं जैसे कालसर्प योग, पितृदोष, नाड़ीदोष, गणदोष, चाण्डालदोष, ग्रहणयोग, मंगलदोष या मांगलिक दोष आदि। इनमें मंगल दोष एक ऐसा दोष है जिसकी वजह से व्यक्ति को विवाह संबंधी परेशानियों, रक्त संबंधी बीमारियों और भूमि-भवन के सुख में कमियां रहती हैं। यहां जानिए मंगल दोष का निवारण करने के लिए कौन-कौन से उपाय करने चाहिए-
    कैसे बनता है मांगलिक दोष: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के प्रथम या चतुर्थ या सप्तम या अष्टम या द्वादश भाव में मंगल स्थित हो तो ऐसी कुंडली मांगलिक मानी जाती है। हांलाकि मांगलिक योग हर स्थिति में अशुभ नहीं होता है। कुछ लोगों के लिए यह योग शुभ फल देने वाला भी होता है।
    जिन लोगों की कुंडली मांगलिक होती है उन्हें प्रति मंगलवार मंगलदेव के निमित्त विशेष पूजन करना चाहिए। मंगलदेव को प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रिय वस्तुओं जैसे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए।
    शास्त्रों के अनुसार मंगल दोष का निवारण मध्यप्रदेश के उज्जैन में ही हो सकता है। अन्य किसी स्थान पर नहीं। उज्जैन ही मंगल देव का जन्म स्थान है और मंगल के सभी दोषों का निवारण यहीं किए जाने की मान्यता है। मंगलदेव के निमित्त भात पूजा की जाती है। जिससे मंगल दोषों की शांति होती है।
    जिन लोगों की कुंडली में मंगलदोष है उनके द्वारा प्रतिदिन या प्रति मंगलवार को शिवलिंग पर कुमकुम चढ़ाया जा सकता है। इसके साथ ही शिवलिंग पर लाल मसूर की दाल और लाल गुलाब अर्पित करें। इस प्रकार भी मंगल दोष की शांति हो सकती है।
    यदि प्रति मंगलवार हनुमानजी का पूजन किया जाए या हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तब भी मंगलदेव के दोषों की समाप्ति हो जाती है। हनुमानजी के पूजन से मंगल के साथ ही शनि दोषों का भी निवारण हो जाता है।
    यदि प्रति मंगलवार हनुमानजी का पूजन किया जाए या हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तब भी मंगलदेव के दोषों की समाप्ति हो जाती है। हनुमानजी के पूजन से मंगल के साथ ही शनि दोषों का भी निवारण हो जाता है।

    मंगल दोष : कारण और निवारण
    क्या करें जब कुंडली में हो मंगल दोष
    Webdunia
    जिस जातक की जन्म कुंडली, लग्न/चंद्र कुंडली आदि में मंगल ग्रह, लग्न से लग्न में (प्रथम), चतुर्थ, सप्तम, अष्टम तथा द्वादश भावों में से कहीं भी स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहते हैं।
    गोलिया मंगल 'पगड़ी मंगल' तथा चुनड़ी मंगल : जिस जातक की जन्म कुंडली में 1, 4, 7, 8, 12वें भाव में कहीं पर भी मंगल स्थित हो उसके साथ शनि, सूर्य, राहु पाप ग्रह बैठे हों तो व पुरुष गोलिया मंगल, स्त्री जातक चुनड़ी मंगल हो जाती है अर्थात द्विगुणी मंगली इसी को माना जाता है।
    मांगलिक कुंडली का मिलान : वर, कन्या दोनों की कुंडली ही मांगलिक हों तो विवाह शुभ और दाम्पत्य जीवन आनंदमय रहता है। एक सादी एवं एक कुंडली मांगलिक नहीं होना चाहिए।
    मंगल-दोष निवारण : मांगलिक कुंडली के सामने मंगल वाले स्थान को छोड़कर दूसरे स्थानों में पाप ग्रह हों तो दोष भंग हो जाता है। उसे फिर मंगली दोष रहित माना जाता है तथा केंद्र में चंद्रमा 1, 4, 7, 10वें भाव में हो तो मंगली दोष दूर हो जाता है। शुभ ग्रह एक भी यदि केंद्र में हो तो सर्वारिष्ट भंग योग बना देता है।
    शास्त्रकारों का मत ही इसका निर्णय करता है कि जहां तक हो मांगलिक से मांगलिक का संबंध करें। ‍िफर भी मांगलिक एवं अमांगलिक पत्रिका हो, दोनों परिवार पूर्ण संतुष्ट हों अपने पारिवारिक संबंध के कारण तो भी यह संबंध श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा नहीं करना चाहिए।
    ऐसे में अन्य कई कुयोग हैं। जैसे वैधव्य विषागना आदि दोषों को दूर रखें। यदि ऐसी स्थिति हो तो 'पीपल' विवाह, कुंभ विवाह, सालिगराम विवाह तथा मंगल यंत्र का पूजन आदि कराके कन्या का संबंध अच्छे ग्रह योग वाले वर के साथ करें।
    मंगल यंत्र विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें। देरी से विवाह, संतान उत्पन्न की समस्या, तलाक, दाम्पत्य सुख में कमी एवं कोर्ट केस इत्या‍दि में ही इसे प्रयोग करें। छोटे कार्य के लिए नहीं।
    विशेष : विशेषकर जो मांगलिक हैं उन्हें इसकी पूजा अवश्य करना चाहिए। चाहे मांगलिक दोष भंग आपकी कुंडली में क्यों न हो गया हो फिर भी मंगल यंत्र मांगलिकों को सर्वत्र जय, सुख, विजय और आनंद देता है।


    मंगल दोष निवारण - Mangal dosh niwaran
    मंगलवार का दिन हनुमान जी की आराधना का विशेष दिन माना जाता है। इसके साथ ही ज्योतिष के अनुसार ये दिन मंगल ग्रह के निमित्त पूजा करने का विधान बताया गया है। मंगल देव की खास पूजा उन लोगों को करनी चाहिए जिनकी कुंडली में मंगल दोष होता है।
    यदि आपकी जन्म कुंडली में मंगल दोष है तो निश्चित ही आपको बहुत सारी परेशानियां घेरे रहती होंगी। समय पर विवाह नहीं होता, धन के संबंध में समस्याएं चलती रहती हैं, घर-जमीन-जायदाद को लेकर तनाव झेलना पड़ता है। मंगल भूमि पुत्र है और भूमि से संबंधित कार्य करने वालों को सबसे अधिक प्रभावित करता है। आप प्रापर्टी के संबंध में सौदे या व्यवसाय करते हैं और अच्छा लाभ कमाना चाहते हैं तो मंगल देवता को खुश रखना बहुत जरूरी है।
    जिनकी लोगों की कुंडली में मंगल दोष होता है वे मंगली कहलाते हैं। ऐसे लोगों को मंगलवार के दिन यहां बताए गए उपाय करना चाहिए। साथ ही जिनकी कुंडली में मंगल अशुभ फल देने वाला है उनके लिए हम यहां कुछ अचूक उपाय बता रहे हैं जिन्हें अपनाने से मंगल आपके अनुकूल हो जाएगा और समस्याएं समाप्त हो जाएंगी।
    मंगलवार हनुमान जी का दिन माना जाता है अत: इस दिन उन्हें सिंदूर और चमेली का तेल अर्पित करें।
    सुंदरकांड या हनुमान चालिसा का पाठ करें।
    प्रति मंगलवार हनुमान चालिसा का जप करें। कार्यों में आलस्य न दिखाए। अपना कार्य ईमानदारी से करते रहें। निकट भविष्य में आपको सफलता मिलेगी, अच्छा समय प्रारंभ हो जाएगा। सिंदूर और चमेली का तेल हनुमान जी को चढ़ाएं।  हनुमान जी को गुड़-चने का प्रसाद चढ़ाएं और हनुमान चालिसा का पाठ करें।
    देवी-देवताओं में हनुमान जी सबसे जल्दी प्रसन्न होने वाले देवता माने जाते हैं। इनकी प्रसन्नता से भक्त की सभी मनोकामनाएं शीघ्र ही पूर्ण हो जाती हैं और धन संबंधी परेशानियां से निजात मिल जाती है।
    यदि किसी व्यक्ति की आर्थिक स्थिति खराब चल रही है तो उसे यहां दिया गया उपाय करना चाहिए। किसी भी शुभ मुहूर्त में या शुभ दिन या मंगलवार या शनिवार के दिन प्रात: काल जल्दी उठें। स्नानादि से निवृत्त हो जाएं। इसके बाद एक नारियल लेकर किसी सिद्ध हनुमान मंदिर जाएं। मंदिर में हनुमान जी के सामने नारियल को अपने मस्तक से लगाएं और अपने नाम, गोत्र का उच्चारण करें। इसके बाद अपने दुखों को दूर करने की प्रार्थना करें। प्रार्थना के बाद नारियल को हनुमान जी के सामने फोड़ दें। इसके बाद बिना पीछे देखें घर लौट आएं।
    इस प्रकार ये उपाय करते रहे तो कुछ ही दिनों में सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने लगेंगे। ध्यान रखें इस दौरान स्वयं को सभी प्रकार के अधार्मिक कार्यों से दूर रखें।

    मंगल दोष के रामबाण उपाय
    ज्योतिष के अनुसार कुंडली में कई प्रकार के दोष बताए गए हैं जैसे कालसर्प योग, पितृदोष, नाड़ीदोष, गणदोष, चाण्डालदोष, ग्रहणयोग, मंगलदोष या मांगलिक दोष आदि। इनमें मंगल दोष एक ऐसा दोष है जिसकी वजह से व्यक्ति को विवाह संबंधी परेशानियों, रक्त संबंधी बीमारियों और भूमि-भवन के सुख में कमियां रहती हैं। यहां जानिए मंगल दोष का निवारण करने के लिए कौन-कौन से उपाय करने चाहिए-
    कैसे बनता है मांगलिक दोष: यदि किसी व्यक्ति की कुंडली के प्रथम या चतुर्थ या सप्तम या अष्टम या द्वादश भाव में मंगल स्थित हो तो ऐसी कुंडली मांगलिक मानी जाती है। हांलाकि मांगलिक योग हर स्थिति में अशुभ नहीं होता है। कुछ लोगों के लिए यह योग शुभ फल देने वाला भी होता है।
    जिन लोगों की कुंडली मांगलिक होती है उन्हें प्रति मंगलवार मंगलदेव के निमित्त विशेष पूजन करना चाहिए। मंगलदेव को प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रिय वस्तुओं जैसे लाल मसूर की दाल, लाल कपड़े का दान करना चाहिए।
    शास्त्रों के अनुसार मंगल दोष का निवारण मध्यप्रदेश के उज्जैन में ही हो सकता है। अन्य किसी स्थान पर नहीं। उज्जैन ही मंगल देव का जन्म स्थान है और मंगल के सभी दोषों का निवारण यहीं किए जाने की मान्यता है। मंगलदेव के निमित्त भात पूजा की जाती है। जिससे मंगल दोषों की शांति होती है।
    जिन लोगों की कुंडली में मंगलदोष है उनके द्वारा प्रतिदिन या प्रति मंगलवार को शिवलिंग पर कुमकुम चढ़ाया जा सकता है। इसके साथ ही शिवलिंग पर लाल मसूर की दाल और लाल गुलाब अर्पित करें। इस प्रकार भी मंगल दोष की शांति हो सकती है।
    यदि प्रति मंगलवार हनुमानजी का पूजन किया जाए या हनुमान चालीसा का पाठ किया जाए तब भी मंगलदेव के दोषों की समाप्ति हो जाती है। हनुमानजी के पूजन से मंगल के साथ ही शनि दोषों का भी निवारण हो जाता है।

     मंगल शांति के उपाय: - (Remedies for Mars )
    1 लाल पुष्पों को जल में प्रवाहीत करें।
    2 मंगलवार को गुड़ व मसूर की दाल जरूर खायें।
    3 मंगलवार को रेवडि़या पानी में विसर्जित करें।
    4 आटे के पेड़े में गुड व चीनी मिलाकर गाय को खिलायें।
    5 मीठी रोटियों का दान करें।
    6 ताँबे के तार में डाले गये रूद्राक्ष की माला धारण करें।
    7 मंगलवार को शिवलिंग पर जल चढ़ावे।
    8 बन्दरों को मीठी लाल वस्तु जैसे - जलेबी, इमरती, शक्करपारे आदि खिलावे।
    9 शिव
    जी या हनुमान जी के नित्य दर्शन करें और हनुमान चालीसा या महामृत्युन्जय मंत्र की रोजाना कम से कम एक माला का जाप करे। हनुमान जी के मन्दिर में दीपदान करें तथा बजरंग बाण का प्रत्येक मंगलवार को पाठ करे।
    10 गेहूँ , गुड़, मंूगा, मसूर, तांबा, सोना, लाल वस्त्र, केशर - कस्तूरी, लाल पुष्प , लाल चंदन , लाल रंग का बैल, धी, पीले रंग की गाय, मीठा भोजन आदि लाल वस्तुओं का दान मंगलवार मध्यान्ह में करें। दीन में मंगल यंत्र का पूजन करें। मंगलवार को लाल वस्त्र पहने।
    11 शुक्ल पक्ष के पहले मंगलवार से 21 या 45 मंगलवार तक अथवा पूरे वर्ष मंगलवार का व्रत करें। गुड़ का बना हलवा भोग लगाने व प्रसाद बाँटने के काम में लाये और सांयकाल को वही प्रसाद ग्रहण करें।
    12 जिस मंगलवार को व्रत करें उस दिन बिना नमक का भोजन एक बार विधिवत मंगल की पूजा अर्चना कर ग्रहण करें।
    13 पति-पत्नि दोनों एक साथ रसोई में बैठकर भोजन करें।
    14 स्नान के बाद सूखे वस्त्र को हाथ लगाने से पहले पूर्व दिशा में मुँह करके सूर्य का अर्ध देकर प्रणाम करें। (सूर्य देव दिखाई दे या न दे)
    15 शयन कक्ष में पलंग पर काँच लगे हो तो उन्हें हटा दे, मंगल का कोप नहीं रहेगा अन्यथा उस काँच में पति - पत्नि का जो भी अंग दिखाई देगा वह रोगग्रस्त हो जायेगा।
    16 मन का कारक चन्द्रमा होता हैं जिसके कारण मन को चंचलता प्राप्त होती हैं। पति-पत्नि के बीच जब भी वाद-विवाद हो, उग्रता आने लगे तब दोनों में से कोई एक उस स्थान से हट जायें, चन्द्र संतुलित रहेगा।
    17 शयन कक्ष में यदि रोजाना पति-पत्नि के बीच वाद-विवाद, झगड़े जैसी घटनाएँ होने लगे तो जन्म कुण्डली के बारहवें भाव में पड़े ग्रह की शान्ति करावें।
    18 दाम्पत्य की दृष्टि से पत्नि को अपना सारा बनाव श्रृगांर (मेकअप) आदि सांयकाल या उसके पश्चात करना चाहिए जिससे गुरू , मंगल और सूर्य अनुकूल होता हैं। दीन में स्त्री जितना मेकअप करेगी पति से उसकी दूरी बढ़ेगी।
    19 पति-पत्नि के बीच किसी मजबूरी के चलते स्वैच्छिक दूरी बढ़े तो पति-पत्नि दोनों को गहरे पीले रंग का पुखराज तर्जनी अंगुली में धारण करना चाहिए।
    20 यह बात ध्यान रखें कि वैवाहिक जीवन में मंगल अहंकार देता हैं स्वाभिमान नहीं। दाम्पत्य जीवन की सफलता हेतु दोनंों की ही आवश्यकता नहीं होती हैं। पाप ग्रहों का प्रभाव दाम्पत्य को बिगाड़ देता हैं। ऐसी स्थिती में चन्द्रमा के साथ जिस पाप ग्रह का प्रभाव हो उस ग्रह की शांति कराने से दाम्पत्य जीवन सुखमय होता हैं। शुक्ल पक्ष मेें पति-पत्नी चाँदनी रात में चन्द्र दर्शन कर, चन्द्रमा की किरणों को अपने शरीर से अवश्य स्पर्श करवावें।
    21 बाग - बगीचा, नदी , समुद्र, खेत, धार्मिक स्थल एवं पर्यटन स्थलों आदि पर पति - पत्नी साथ जायें तो श्रेष्ट होगा। इससे गुरू व शुक्र प्रसन्न होगें, इसके विपरीत कब्रिस्तान , कोर्ट - कचहरी , पुलिस थाना , शराब की दुकान , शमशान व सुना जंगल आदि स्थानों पर पति-पत्नी भूलकर भी साथ न जायें।
    22 मंगल के कोप के कारण बार - बार संतान गर्भ में नष्ट होने से पति-पत्नी के बीच तनाव , रोग एवं परेशानियां उत्पन्न होती हैं ऐसी स्थिति में पति - पत्नी को महारूद्र या अतिरूद्र का पाठ करना चाहिए।
    23 मंगल की अशुभ दशा , अन्तर्दशा में पति - पत्नी के बीच कलह , वाद - विवाद व अलगाव सम्भावित हैं। ऐसी स्थिती में गणपति स्त्रोत , देवी कवच , लक्ष्मी स्त्रोत , कार्तिकेय स्त्रोत एवं कुमार कार्तिकेय की नित्य पूजा अर्चना एवं पाठ करना चाहिए।
    24 जिन युवक-युवतियों का विवाह मंगल दोष के कारण नहीं हो रहा हैं, उन्हें प्रतीक स्वरूप विवाह करना चाहिए। जिनमें कन्या का प्रतीक विवाह भगवान विष्णु से या सालिग्राम के पत्थर या मूर्ति से कराया जाता हैं। इसी प्रकार पुरूष का प्रतीक विवाह बैर की झाडि़यों से कराया जाता हैं।
    25 विवाह के इच्छुक मांगलिक युवक-युवतियों को तांबंे का सिक्का पाकेट या पर्स में रखना चाहिए। तांबें की अंगुठी अनामिका अंगुली में धारण करे, तांबे का छल्ला साथ रखें, रात्रि में तांबे के पात्र में जल भरकर रखें व प्रातः काल उसे पीयें।
    26 प्रतिदिन तुलसी को जल चढ़ाने और तुलसी पत्र का सेवन करने से मंगल के अनिष्ठ शांत होते हैं।
    27 अपना चरित्र हमेशा सही रखें । झूठ नहीं बोले । किसी को सताए नहीं । झूठी गवाही कभी भी ना देवे । दक्षिण दिशा वाले द्वार में न रहें । किसी से ईष्र्या, द्वेश भाव न रखे । यथा शक्ति दान करें ।
    28 मंगलवार के दिन सौ गा्रम बादाम दक्षिणमुखी हनुमानजी के यहां ले जावे । उनमें से आधे बादाम मंदिर में रख देवे और आधे बादाम घर लाकर पूजा स्थल पर रखें । बादाम खुले में ही रखे । यह जब तक रखे जब तक की आपकी मंगल की महाद
    शा चलती हैं ।
    29 मूंगा या रूद्राक्ष की माला हमेशा अपने गले में धारण करें ।
    30 आँखो में सुरमा लगावें । जमीन पर सोयें । गायत्री मंत्र का जाप संध्याकाल में करें ।
    31 नित्य सुबह पिता अथवा बड़े भाई के चरण छुकर आशीर्वाद लेवें ।
    32 मंगल की शांति हेतु मूंगा रत्न धारण करना चाहिए इसके लिए चांदी की अंगुठी में मूंगा जड़वाकर दायें हाथ की अनामिका में धारण करना चाहिए। मंूगे का वजन 6 रत्ती से अधिक होना चाहिए। धारण करने से पूर्व मंूगे को गंगाजल, गौमूत्र अथवा गुलाब जल से स्नान करवाकर शुद्ध करें तत्पश्चात विधि अनुसार धारण करें।
    33 जो जातक मूंगा धारण नहीं कर सकते उन्हें तीनमुखी रूद्राक्ष धारण कराना चाहिए । तीन मुखी रूद्राक्ष को लाल धागे में गुथकर धूपित करके, मंगलवाल के दिन गले या दाहिने हाथ में धारण करें । इसके प्रभाव से उन्हें मंगल शांति में सफलता मिलती हैं ।
    34 क्रुर व उग्र होते हुए भी सौम्य ग्रहों की युति से मंगल विशेष सौम्य फल प्रदान करता हैं । चन्द्र व मंगल की युति आकस्मिक धनप्राप्ति, शनि मंगल की युति डुप्लीकेट सामान बनाने व नकल करने में माहिर बनाता हैं, ऐसा व्यक्ति कार्टूनिस्ट, पोट्रेट आर्टिस्ट व मुखौटे बनाने में निपुण हो सकता हैं । शुक्र व मंगल की युति फोटोग्राफी, सिनेमा तथा चित्रकारी आदि की योग्यता भी देता हैं । बुध के साथ युति होने पर जासूस का वैज्ञानिक और मांगलिक प्रभाव भी नष्ट करता हैं, किन्तु जिन घरों पर वह दृष्टि डालता हें वहां अवश्य ही हानि करने वाला होता हैं । कुण्डली में सातवां घर मंगल का ही माना जाता हैं क्योकिं यह मंगल की उच्च राशि हैं । अतः सातवां घर मंगल की स्वराशि का घर कहलाता हैं ।
    35 पुत्रहीनता तथा ऋणग्रस्तता दूषित मंगल की ही देन होती हैं । स्त्रियों में कामवासना का विशेष विचार भी मंगल से किया जाता हैं । मंगल के प्रभाव से होने वाले रोगादि रक्त-सम्बन्धी रोग, पित्त विकार, मज्जा विकार, नेत्र विकार, जलन, तृष्णा, मिर्गी व उन्माद आदि मानसिक रोग, चर्म रोग, अस्थिभ्रंश, आॅपरेशन, दुर्घटना, रक्तस्त्राव व घाव, पशुभय, भूत-पिशाच के आवेश से होने वाली पीड़ाएं आदि विशेष हैं । निर्बल होने से यह जीवन शक्ति उत्साह व उमंग का नाश करता हैं तथा कायर बनाता हैं ।
    Courtesy Pt Ashu Bahuguna G

     मंगली दोष निवारण के सरल उपाय 

    मंगली दोष निवारण के सरल उपाय जिस व्यक्ति की कुंडली में मंगली दोष बन रहा हो उस व्यक्ति को अग्रलिखित उपाय करने चाहिए जिससे की मंगली दोष के नकारात्मक प्रभाव से वह बच सकें -
    - मीठी रोटियां दान करें .
    - मंगलवार को सुन्दरकाण्ड का पाठ करें.
    - बंदरों को लाल मीठी वास्तु खिलाएं.
    - मंगलवार को बतासे या रेवड़ियाँ पानी में प्रवाहित करें.
    - आटे की लोई में गुड़ रखकर गाय को खिला दें.
    - मंगली कन्यायें गौरी पूजन तथा श्रीमद्भागवत के 18 वें अध्याय के नवें श्लोक का जप अवश्य  करें.
    - प्रत्येक मंगलवार को मंगल स्नान करें.
    - विवाह के समय कुंडली मिलान अवश्य करें.
     
     1 Dec 2012 मंगल दोष और होने वाली परेशानिया astro अंकल लाइव
    ये भ्रम  लोगो को की मंगली होने का मतलब मंगल दोष होता है
    मंगल दोष 28 वे वर्ष में अपने आप समाप्त हो जाता है और बिना कुंडली मिलाये शादी करा देनी चाहिए ये गलत धारणा है
    मंगल दोष वाले माता पिता की संतान का 5 वर्ष की आयु तक बेहद खास  ध्यान रखने की जरूरत होती
    है क्यूंकि उसका immune सिस्टम काफी कमजोर होगा इस बात की बहुत संभावना होती है
    मंगल दोष वाले लोग विधुर /विधवा हो जायेंगे ये एक मिथ्या धारणा है
    मंगली होने का ये मतलब नहीं है की मंगल दोष होगा
    मंगल दोष के कारण लोगो के प्रेम सम्बन्ध टूट जाते है और ये दुःख दे के टूटते है
    पिता व भाई की ख़ुशी में कमी होती है
    यदि बृहस्पति मजबूत हुआ तो मंगल दोष वाले love मैरिज के बाद भी सम्बन्ध टूट जाने वाली situation आ सकती है
    मंगल दोष जब बहुत जादा प्रभावित करता है तो लोग शादी के लिए आपको approach करेंगे लेकिन जैसे ही आप
    कही बात करोगे तो वो बात टूट जाएगी आपको कोई response नहीं देगा लोग आपके फ़ोन का उत्तर तक
    नहीं देंगे ,रिश्ते नहीं आएंगे आएंगे भी तो टूट जायेंगे
    यदि रिश्ते आये भी तो आपकी तरफ से कोशिश करने से बात नहीं बनेगी
    किसी ख़राब पार्टनर के साथ जीवन जीने से अच्छा है की अकेले ही रहा  जाये
    ज्योतिष के according 70% लोग मंगल दोष से प्रभावित या पीड़ित मिलेंगे
    बिना सोचे समझे या जाने ज्योतिष के फंडे न लगाये सिर्फ लैपटॉप ले के सॉफ्टवेयर
    से कुंडली बना लेने से राशी भाव और गृह देख लेने मात्र से कोई ज्योतिषी नहीं हो जाता
    उसके लिये गहरे ज्ञान की आवश्यकता भी होती है
    पति पत्नी में मंगल दोष हो तो वो एक दूसरे की इज्जत नहीं करेंगे
    मंगल की छाया या आंशिक मंगल कुछ लोग बोलते है ऐसा नहीं होता
    मंगल दोष से प्रभावित लोगो को लम्बे समय तक (या सही शब्दों में जीवन पर्यंत उपाय )
    करने चाहिए
    खून में heamoglobin कम होने पे हरी मिर्च खाए ये आपकी मदद करती है
    कुंडली में सिर्फ मंगल की विशेष positions (1,2,4,7,8) पे होने के कारण ही मंगल दोष नहीं लगता
    मंगली होना और मंगल दोष होना दो अलग अलग चीज़े है
    यदि किसी की कुंडली में मंगल दोष है तो प्रेम संबंधो में सावधान रहने की जरूरत है
    अधिकतर ऐसे सम्बन्ध चरित्र पे दाग लग के टूट जाते है
    misconception जो मंगली/मंगल दोष से प्रभावित होते है उनका विवाह नहीं होता
    मंगल दोष वाले माता पिता की संतान को कष्ट होता है (इससे रिकवर किया जा सकता है )
    मंगल शारीरिक शक्ति को denote करता है यदि कमजोर होगा तो शारीरिक उर्जा कम होगी
    ऐसे लोगो की संतान बीमार बहुत जल्दी जल्दी होगी ,यदि आपको मंगल दोष हो तो
    ऐसे  माता पिता अपने घर का माहौल शांत रखे
    misconcept मंगल दोष वालो का मंगल दोष जीवन के 28वे वर्ष में ख़त्म हो जाता है
    ये बात सही नहीं है
    जीवन मन्त्र जो लोग अपने इष्ट की साधना पूजा अच्छे समय में भी करते रहते है नियमित रूप से
    वो लोग अपने जीवन में आने वाले कठिन समय से पार हो जाते है उनके सामने रास्ता बन जाता है उस
    कठिन समय में भी जो व्यक्ति अपने इष्ट में विश्वास नहीं रखता इष्ट की साधना नहीं करता उस व्यक्ति के
    रास्ते बंद हो जाते है और बुरा वक्त उसे हरा देता है
    परंपरा हनुमान जी की एक विशेष साधना करी जाती है ये मूलतः धन की रक्षा के लिये करी जाती है जीवन
    में कभी भी किसी प्रकार की दिक्कत आती है या कभी भी आपको रक्षा की आवश्यकता हो
    तो आप इस उपाय को कर सकते है धन की रक्षा के लिए हनुमान जी की विशेष साधना ये है की पूर्णमासी को
    मौली से नारियल बांध कर उन्हें अर्पित करे और फिर वही से हनुमान जी के चरणों का तिलक ले के आइये और
    फिर उसे अपनी तिजोरी पे लगा दीजिये ये यदि आपका ईमानदारी का धन है लेकिन खतरे में पड़ गया है तो
    हनुमान जी अपने आप जिम्मेदारी ले के ठीक कर देते है
    मंगल दोष से प्रभावित माँ अपने बच्चे की सेहत को ले के काफी परेशान (possesive ) रहती है
    माँ या पिता दोनों अपने बच्चे को ले के काफी possesive होते है
    मंगल दोष जिन लोगो की कुंडली में हो वो शादी होने के बाद भी अलग अलग  कुम्भ विवाह जरूर करा ले
    मंगल दोष से प्रभावित पिता अपने बच्चो पे क्रोध बहुत करते है
    इससे उनका बच्चा चिड चिड़ा हो जाता है या उसका स्वभाव आगे चल कर विद्रोही बन जाता है
    मंगल दोष के उपाय के तौर पे
    माँ /साधू संत /बन्दर की सेवा करे
    लाल मिर्च का सेवन न करे (मंगल दोष वाले )
    लाल रंग से बहुत  परहेज करना है
    कुश के आसन पे बैठ कर ॐ क्रां क्रीं क्रौं सः भौमाय नमः  या
    ॐ अं अंगारकाय नमः मन्त्र का लाल चन्दन की माला से जप करे रुद्राक्ष की माला पे भी कर सकते है
    मंगल दोष वालो को हमेशा सर दर्द बना रहता है
    चीनी /शहद /गुड़ का दान मेहनत मजदूरी करने वाले लोगो को जरूर करे (ये भिक्षा नहीं है )
    ऐसे लोगो को ताम्बे का छल्ला मंगलवार को अनामिका में धारण कर लेना चाहिए वैवाहिक
    जीवन के दुःख भी शांत होंगे और सर दर्द पे भी असर पड़ेगा
    थोड़े से चावलों को बहते हुए पानी में डाल दीजियेगा ज्यादा चावल की जरूरत नहीं है उपाय केवल संकेत मात्र होता है
    चांदी की ठोस गोली गले में सोमवार को जरूर धारण करियेगा
    मिटटी के बर्तन में 5 लाल ईंट डाल कर  किसी निर्जन स्थान में दबाये जीवन भर ये करे महीने में 1 बार ये उपाय जरूर करे (जीवन भर )
    किसी पूजा स्थान आश्रम या मजदूर के घर की दिवार बनवाये
    यदि शादी में compromise करना पड़े तो उसे मन से करियेगा
    मंगल ब्लड या RH factor का भी स्वामी है यदि मंगल सही से मैच न हो तो ऐसे लोगो को संतान होने में
    कष्ट हो जाता है ,कई लडकियो में शादी के बाद hormonal disturbance हो जाते है और उसकी वजह
    से संतान होने में काफी कष्ट होता है ,
    मंगल दोषह दोष से प्रभावित लोगो को अकेले नहीं रहना चाहिये
    मंगल दोष वाले बच्चो के पिता (पिता की कुंडली में मंगल दोष ) उनपे बहुत गुस्सा करते है
    उससे बच्चा विद्रोही हो जाता है
    मंगल दोष से प्रभावित लोगो की कुंडली में गण मिलाये बिना विवाह न करे
    उचित गण मिल जाने पे मंगल दोष काफी हद तक कम हो जाता है
    किसी पूजा स्थान की दीवार जरूर बनवाये चाहे वो 1 इंच की ही क्यूँ न हो
    जो लोग scientifically ज्योतिष पढ़ रहे है वो जरा गहराई में इस सब्जेक्ट को समझे सिर्फ
    भावों राशियों से ही न रुके
    किसी प्रश्न का उत्तर
    आदमी कैंसर का patient था ,wife से relation अच्छा नहीं था ,
    एक बेटा है 35 साल का वो माँ को छोड़ना नहीं चाहता और कहता है की कुछ भी हो
    जाये चाहें नौकरी मिले या न मिले वो माँ को छोड़ के नहीं जायेगा
    पत्नी को ये काफी कुछ सुना देते है लेकिन बाद में दुःख होता है ,वाइफ को schinofinia ,
    father  की 100 करोड़ की प्रॉपर्टी है और उससे debar कर के गए है ,बाईपास सर्जरी भी हो चुकी है
    रोज घर वालो से गालिया खाते है ,जानना चाहते है की कभी वाइफ से रिलेशन ठीक हो सकेगा या नहीं
    क्या उपाय करे
    जवाब पितृ दोष की गंभीर condition है एक विशेष किस्म का चंडी यग्य कराना पड़ता है
    और एक लाल आसन पे बैठ के
    ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै वा दुर्गे दुर्गे रक्षिणी स्वाहा
    मन्त्र जप कर के एक सामान्य समिधा से रेगुलर हवन करे
    ॐ अग्नि देवाय नमः मन्त्र से 1 साल तक हवन करे
    चूँकि ये गंभीर पितृ दोष है  तो ये इसका विशेष उपाय है
    इस परिस्थिति में पितृ दोष के सामान्य उपाय की बजाये ये उपाय करिये
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     भात पूजन केवल उज्जैन में ।
    मंगल दोष के दुष्प्रभाव से बचाव के उपाय
    जन्म लग्न कुण्डली के उपरोक्त मांगलीक दोषो के कारण मानव जीवन पर होने वाले दुष्प्रभावो को पूजा पाठ, जाप, अनुष्ठान, दान आदि के द्वारा पूर्णत: समाप्त किया जा सकता है। एवं मंगल के शुभ प्रभावो को बढाया जा सकता है। जिसके कुछ उपाय निम्नानुसार वर्णन किये जा रहा है ऐसे जातकगण जिनकी कुण्डली में मांगलिक दोष है वे इससे पूरी तरह लाभान्वित होंगे ।
    मंगल ग्रह शान्ति :– चुंकि मंगल एक उग्र एवं विस्फोटक ग्रह है, यदि मंगल आपकी लग्न कुण्डली को प्रभावित कर रहा है तो इसकी शान्ति कराना उतना ही आवश्यक है, जिस तरह एक व्यक्ति बिमार पडने पर औषधियो को लेने पर ही ठीक होता है, उसी तरह मंगल दोष निवारण के प्रभावी उपाय निम्नलिखित है:
    मंगल ग्रह की शांति भात पूजन द्वारा
    सम्पूर्ण विश्व में भारत देश के अंर्तगत मध्यप्रदेश के उज्जैन शहर में एक मात्र मंग्रल ग्रह का मंदिर है, जहॉं ब्रम्हाण्ड से मंगल ग्रह की सीधी किरणे कर्क रेखा पर स्थित स्वयंभू शिवलिंग के उपर पढती है, जिससे यह शिवलिंग मंगल ग्रह के प्रतीक स्वरूप में जाना जाता है तथा यहॉ पर पूजन, अभिषेक, जाप व दर्शन से मंगलदोश का निवारण होता है।
    मंगल दोश निवारण भात पूजन द्वारा एक मात्र अवंतिका ( उज्जैन ) में ही सम्पन्न कराया जाता है। यहॉ विधिवत् भात पूजन कराने से मंगल ग्रह के दुष्प्रभाव में कमी आकर शुभ फलो की वृद्धि होती है।
    पूजन की विधि
    भात पूजन में सर्वप्रथम गणेश गौरी पूजन के पश्चात नवग्रह पूजन, कलश पूजन एवं शिवलिंग रूप भगवान का पंचामृत पूजन एवं अभिषेक वैदिक मंत्रोचार द्वारा किया जाता है , पश्चात भगवान को भात अर्पित कर आरती एवं पूजन किया जाता है। जिससे पूजन कराने वाले को विशेष शुभ फलो की प्राप्ति होती है। भात पूजन मंग्रह दोष निवारण का प्रभावी एवं त्वरित उपाय है । 

     यदि कन्या की कुंडली में 'मंगल दोष', 'वैधव्य दोष' या 'विष योग' हो तो उपचार है कुंभ विवाह। यदि कन्या की कुंडली में वैधव्य, संबंध विच्छेद अथवा बहुविवाह योग हो तो उसका समाधान अनिवार्य है। इसी प्रकार कन्या की कुंडली में वैधव्य योग भी विचारणीय है।
    1. जिस कन्या की कुंडली में सप्तम भाव में मंगल पाप ग्रहों से युक्त हो तथा पाप ग्रह सप्तम भाव में स्थित मंगल को देखते हों तो बाल विधवा योग होता है।
    2. लग्न एवं सप्तम भाव में पाप ग्रह हो तो 'वैधव्य योग' होता है।
    3. सप्तम भाव में पापग्रह हो तथा चंद्रमा षष्ठ या सप्तम भाव में हो तो वैधव्य योग होता है।
    4. पाप ग्रह से दृष्ट पाप ग्रह अष्टम में हो तो वैधव्य योग होता है।
    5. सप्तमेश एवं अष्टमेश पाप ग्रहों से पीडि़त होकर षष्ठ या द्वादश भाव में हो तो वैधव्य योग होता है।
    इत्यादि जितने भी वैधव्य कारक अरिष्ट योग, जैसे कि मांगलिक दोष या विषकन्या दोष-इन सभी से दूषित कन्या के सुखी दांपत्य हेतु शास्त्रों में कुंभ विवाह का परामर्श दिया हुआ है।
    'बालवैधव्ययोगे तु कुंभ दुपतिमाादिभि:। कृत्वा लग्न तत: प्रश्चात् कन्योद्वाह्योति चापरे', अर्थात- घट विवाह के उपरांत ही विवाह करें। कुंभ विवाह की प्रक्रिया विवाह के ही शुभ मुहूर्त में (विवाह की घोषित तिथि से पहले कभी भी) शुभ लग्न के समय कन्या के सुखी और स्थाई दांपत्य जीवन हेतु विष्णु रूप कुंभ से विवाह करा लें। इस प्रक्रिया में गणपति, पुण्याहवाचन कुल देवता का पूजन कर ग्रह शांति करें। पुन: शाखोच्चार के साथ विष्णु रूप कलश का षोडशोपचार से पूजन करें और फिर उसी कलश की अग्नि सहित कन्या सात परिक्रमा करे, ब्राह्मण मंगलाष्टक का पाठ करें, तदुपरानत कन्या का अभिषेक कर आशीर्वाद दें। इस प्रकार शास्त्र विधि पूर्वक 'घट विवाह' करने से वह कन्या सुखी एवं सौभाग्यशालिनी हो जाती है। ज्ञातव्य है कि परमपुरुष परमात्मा विष्णु सब के पति हैं, अस्तु विष्णु से विवाह होने के कारण उक्त दोष का शमन हो जाता है। विवाह के पश्चात कन्या विवाह के समय पहने वस्त्राभूषण को परित्याग दे। अर्थात उक्त वस्त्राभूषण को धारण न करे

     कौन होते हैं मंगली, जानिए मंगली स्त्री-पुरुष से जुड़ी खास बातें
    धर्म डेस्क |
    कौन होते हैं मंगली, जानिए मंगली स्त्री-पुरुष से जुड़ी खास बातें
    उज्जैन। आज भी जब किसी स्त्री या पुरुष के विवाह के लिए कुंडली मिलान किया जाता है तो सबसे पहले देखा जाता है कि वह मंगली है या नहीं। ज्योतिष के अनुसार यदि कोई व्यक्ति मंगली है तो उसकी शादी किसी मंगली से ही की जानी चाहिए। इसके पीछे धारणाएं बताई गई हैं।
     क्या आप जानते हैं मंगली शब्द किन लोगों के लिए उपयोग किया जाता है। किन कारणों से कोई स्त्री या पुरुष मंगली होते हैं? मंगली होने के प्रभाव क्या-क्या होते हैं? यदि आप इन प्रश्नों के उत्तर नहीं जानते हैं तो यहां जानिए मंगली शब्द से जुड़ी खास बातें...
     मंगल से प्रभावित होते हैं मंगली
     ज्योतिष के अनुसार मंगली लोगों पर मंगल ग्रह का विशेष प्रभाव होता है। यदि मंगल शुभ हो तो वह मंगली लोगों को मालामाल बना देता है। मंगली व्यक्ति अपने जीवन साथी से प्रेम-प्रसंग के संबंध में कुछ विशेष इच्छाएं रखते हैं, जिन्हें कोई मंगली जीवन साथी ही पूरा कर सकता है। इसी वजह से मंगली लोगों का विवाह किसी मंगली से ही किया जाता है।
    कौन होते हैं मंगली?

    कुंडली में कई प्रकार के दोष बताए गए हैं। इन्हीं दोषों में से एक है मंगल दोष। यह दोष जिस व्यक्ति की कुंडली में होता है वह मंगली कहलाता है। जब किसी व्यक्ति की जन्म कुंडली के 1, 4, 7, 8, 12 वें स्थान या भाव में मंगल स्थित हो तो वह व्यक्ति मंगली होता है।
    मंगल के प्रभाव के कारण ऐसे लोग क्रोधी स्वभाव के होते हैं। ज्योतिष के अनुसार मंगली व्यक्ति की शादी मंगली से ही होना चाहिए। यदि मंगल अशुभ प्रभाव देने वाला है तो इसके दुष्प्रभाव से कई क्षेत्रों में हानि प्राप्त होती है। भूमि से संबंधित कार्य करने वालों को मंगल ग्रह की विशेष कृपा की आवश्यकता है।
     मंगल देव की कृपा के बिना कोई व्यक्ति भी भूमि संबंधी कार्य में सफलता प्राप्त नहीं कर सकता। मंगल से प्रभावित व्यक्ति अपनी धुन का पक्का होता है और किसी भी कार्य को बहुत अच्छे से पूर्ण करता है।
    हमारे शरीर में सभी ग्रहों का अलग-अलग निवास स्थान बताया गया है। ज्योतिष के अनुसार मंगल ग्रह हमारे रक्त में निवास करता है।
    मंगली लोगों की खास बातें...
    मंगली होने का विशेष गुण यह होता है कि मंगली कुंडली वाला व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी को पूर्ण निष्ठा से निभाता है। कठिन से कठिन कार्य वह समय से पूर्व  ही कर लेते हैं। नेतृत्व की क्षमता उनमें जन्मजात होती है।
    ये लोग जल्दी किसी से घुलते-मिलते नहीं परंतु जब मिलते हैं तो पूर्णत: संबंध को निभाते हैं। अति महत्वाकांक्षी होने से इनके स्वभाव में क्रोध पाया जाता है। परंतु यह बहुत दयालु, क्षमा करने वाले तथा मानवतावादी होते हैं। गलत के आगे झुकना इनको पसंद नहीं होता और खुद भी गलती नहीं करते।
    ये लोग उच्च पद, व्यवसायी, अभिभाषक, तांत्रिक, राजनीतिज्ञ, डॉक्टर, इंजीनियर सभी क्षेत्रों में यह विशेष योग्यता प्राप्त करते हैं। विपरित लिंग के लिए यह विशेष संवेदनशील रहते हैं, तथा उनसे कुछ विशेष आशा रखते हैं। इसी कारण मंगली कुंडली वालों का विवाह मंगली से ही किया जाता है।
    ग्रहों का सेनापति है मंगल
    ज्योतिष शास्त्र के अनुसार नौ ग्रह बताए गए हैं जो कुंडली में अलग-अलग स्थितियों के अनुसार हमारा जीवन निर्धारित करते हैं। हमें जो भी सुख-दुख, खुशियां और सफलताएं या असफलताएं प्राप्त होती हैं, वह सभी ग्रहों की स्थिति के अनुसार मिलती है। इन नौ ग्रहों का सेनापति है मंगल ग्रह। मंगल ग्रह से ही संबंधित होते है मंगल दोष। मंगल दोष ही व्यक्ति को मंगली बनाता है।
    पाप ग्रह है मंगल
    मंगल ग्रह को पाप ग्रह माना जाता है। ज्योतिष में मंगल को अनुशासन प्रिय, घोर स्वाभिमानी, अत्यधिक कठोर माना गया है। सामान्यत: कठोरता दुख देने वाली ही होती है। मंगल की कठोरता के कारण ही इसे पाप ग्रह माना जाता है। मंगलदेव भूमि पुत्र हैं और यह परम मातृ भक्त हैं। इसी वजह से माता का सम्मान करने वाले सभी पुत्रों को विशेष फल प्रदान करते हैं। मंगल बुरे कार्य करने वाले लोगों को बहुत बुरे फल प्रदान करता है।
    मंगल के प्रभाव
    मंगल से प्रभावित कुंडली को दोषपूर्ण माना जाता है। जिस व्यक्ति की कुंडली में मंगल अशुभ फल देने वाला होता है उसका जीवन परेशानियों में व्यतीत होता है। अशुभ मंगल के प्रभाव की वजह से व्यक्ति को रक्त संबंधी बीमारियां होती हैं। साथ ही, मंगल के कारण संतान से दुख मिलता है, वैवाहिक जीवन परेशानियों भरा होता है, साहस नहीं होता, हमेशा तनाव बना रहता है।
    यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल ज्यादा अशुभ प्रभाव देने वाला है तो वह बहुत कठिनाई से जीवन गुजरता है। मंगल उत्तेजित स्वभाव देता है, वह व्यक्ति हर कार्य उत्तेजना में करता है और अधिकांश समय असफलता ही प्राप्त करता है।
    मंगल का ज्योतिष में महत्व: ज्योतिष में मंगल मुकदमा ऋण, झगड़ा, पेट की बीमारी, क्रोध, भूमि, भवन, मकान और माता का कारण होता है। मंगल देश प्रेम, साहस, सहिष्णुता, धैर्य, कठिन, परिस्थितियों एवं समस्याओं को हल करने की योग्यता तथा खतरों से सामना करने की ताकत देता है।
     मंगल की शांति के उपाय: भगवान शिव की स्तुति करें। मूंगे को धारण करें। तांबा, सोना, गेहूं, लाल वस्त्र, लाल चंदन, लाल फूल, केशर, कस्तुरी, लाल बैल, मसूर की दाल, भूमि आदि का दान।